Saturday, March 20, 2010

आह भी भरने नहीं देता

कसकते हैं मगर इक आह भी भरने नहीं देता 
ज़माना घाव को भी घाव अब कहने नहीं देता 

महत्वाकांक्षाएं  तो   खड़ी   हैं   पंख    फैलाए  
बिछाकर जाल बैठा जग उन्हें उड़ने नहीं देता

कभी तो धुंध ने घेरा कभी घेरा कुहासे ने
अँधेरा अब उजाले को कहीं रहने नहीं देता

नदी के स्रोत पर ही रुक रहा है धार का पानी
मुहाना यार आगे धार को बहने नहीं देता

हुई है इसलिए बोझिल हमारी रीढ़ की हड्डी
विनय उठने नहीं देती अहम् झुकने नहीं देता

समझ पाए नहीं हम आचरण अब तक ज़माने का
कभी जीने नहीं देता कभी मरने नहीं देता

है 'भारद्वाज' जलने को मगर धुँधुआ रही केवल 
समय इस ज़िन्दगी की आग को जलने नहीं देता 

चंद्रभान भारद्वाज

6 comments:

सिद्धार्थ प्रियदर्शी said...

परम आदरणीय भारद्वाज साहब !!
मेरी समझ और हुनर उस मुक़ाम तक नहीं है कि आप कि गज़ल पर कोई टिप्पड़ी के सकूँ ...फिर भी ....बेहद उम्दा..!!

"अर्श" said...

हुई है इसलिए बोझिल हमारी रीढ़ की हड्डी
विनय उठने नहीं देती अहम् झुकने नहीं देता

इस शे'र को जो आपने सलामती बख्शा है , कुछ कह नहीं पा रहा हूँ,..
परम्परा और संस्कार को जो गहना पहनाया है आपने इस ग़ज़ल को इस खुबसूरत शे'र से वो अपने आप में कमाल की बात है.... और हाँ आपसे बात कर के बहुत ख़ुशी हुई ..

अर्श

वीनस केशरी said...

आपकी हर गजल की तरह बेहतेरीन

सभी शेर दिल में उतर गये,,,
इस कशमकश से उबर नहीं पाया की कौन सा शेर सबसे बढ़िया लगा :)

वीनस

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

कभी तो धुंध ने घेरा कभी घेरा कुहासे ने
अँधेरा अब उजाले को कहीं रहने नहीं देता
आदरणीय भारद्वाज जी, आसान नहीं रहा होगा,
ये शेर हो पाना....
फिर भी कितने सरल शब्दों में कह गये आप....
वाह.....वाह.....वाह
हुई है इसलिए बोझिल हमारी रीढ़ की हड्डी
विनय उठने नहीं देती अहम् झुकने नहीं देता.
दाद...मुबारकबाद....और सलाम.

नीरज गोस्वामी said...

हुई है इसलिए बोझिल हमारी रीढ़ की हड्डी
विनय उठने नहीं देती अहम् झुकने नहीं देता

इस शेर और पूरी ग़ज़ल के लिए सिर्फ एक ही लफ्ज़ ज़ेहन में आता है...सुभान अल्लाह...
नीरज

हरकीरत ' हीर' said...

कसकते हैं मगर इक आह भी भरने नहीं देता
ज़माना घाव को भी घाव अब कहने नहीं देता
वल्लाह.....!!
महत्वाकांक्षाएं तो खड़ी हैं पंख फैलाए
बिछाकर जाल बैठा जग उन्हें उड़ने नहीं देता
बहुत खूब ......!!
कभी तो धुंध ने घेरा कभी घेरा कुहासे ने
अँधेरा अब उजाले को कहीं रहने नहीं देता
बेमिसाल ........!!
हुई है इसलिए बोझिल हमारी रीढ़ की हड्डी
विनय उठने नहीं देती अहम् झुकने नहीं देता
वाह......लाजवाब.......!!
समझ पाए नहीं हम आचरण अब तक ज़माने का
कभी जीने नहीं देता कभी मरने नहीं देता

ओये होए ......सुभानाल्लाह .....ये उम्र और ये नजाकत ......अगली फरमाइश अभी से है .....!!