Friday, August 12, 2016

     यह रोग क्या लगा है मुझे 

जाने यह रोग क्या लगा है मुझे 
कोई लगती नहीं दवा है मुझे 

हों खुली या कि बंद हों आँखें 
उसका चेहरा ही दीखता है मुझे 

फेर कर मुँह को आज बैठा है 
जिसकी नज़रों का आसरा है मुझे 

मैंने तो ज़िन्दगी खफा दी है 
उसने बस दर्द ही दिया है मुझे 

जिसका विश्वास मेरी पूँजी थी 
शक की नज़रों से देखता है मुझे 

इक लिफाफे में कोरा कागज है 
पत्र में जाने क्या कहा है मुझे 

वक़्त अंधा है रेबड़ी बाँटे 
मेरा हक़ भी कहाँ मिला है मुझे 

उम्र भर साथ तो दिया मैंने 
साथ पर उसने कब दिया है मुझे 

साथ छूटा मगर रखा रिश्ता 
मान रिश्तों का साधना है मुझे 

मेरी नींदों को सिर्फ लौटा  दे 
अब न कुछ और कामना है मुझे 

नाव जर्जर है 'भारद्वाज'मेरी 
अपने अंजाम का पता है मुझे 

Tuesday, July 5, 2016

                     बात करते हैं

लिए विष के मगर अमृत घड़ों की बात करते हैं 
भरे दुर्गंध से पर केवडों  की बात करते हैं 

बनाने के लिए बहुमंज़िला प्रासाद खुद अपने 
गिराने के लिए बस झोपड़ों की बात करते हैं 

विवश होकर गरीबी से हुईं हैं आत्महत्याएं 
वो पर थोथी प्रगति के आँकड़ों की बात करते हैं 

अचर्चित बैंक से गुपचुप करोड़ों लूटने वाले 
किसानों के मगर डूबे ऋणों की बात करतेहैं 

जिन्होंने उम्र भर बस खिड़कियों के काँच फोड़े हैं 
उन्हीं कुछ पत्थरों की कंकड़ों की बात करते हैं 

जो कल तक दो समय की रोटियाँ  गिनते रहे केवल 
अभी लाखों करोड़ों सैकड़ों की बात करते हैं 

जो आँधी  के तनिक से वेग से होते धराशायी 
वो धरती में जमीं अपनी जड़ों की बात करते हैं 

निकल कर माँद से बाहर कभी सागर नहीं देखा 
वो बस बरसात के उथले गडों की बात करते हैं 

उभरते डाकुओं के चित्र अक्सर आँख के आगे 
वो जब चम्बल के फैले बीहड़ों की बात करते हैं 

कोई भी हौसला पर्वत के आगे झुक नहीं सकता 
स्वयं जब हाथ गेंती फावड़ों की बात करते हैं 

नहीं मालूम 'भारद्वाज ' जिनको सभ्यता अपनी 
हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की बात करते हैं 

चंद्रभान  भारद्वाज 
                   कहाँ मिलता है 

हर  शिखर छूने को सोपान कहाँ मिलता है 
हर समस्या का समाधान कहाँ मिलता है 

हर सफलता ही कठिन पथ से निकलती है सदा 
तप  बिना कोई भी वरदान कहाँ मिलता है 

ध्येय से ध्यान भटकता है  अगर साधक का 
तीर को लक्ष्य का संधान कहाँ मिलता है 

गुरु का हो नाम भले मूर्ति रहे मिटटी की 
गुरु की सद दृष्टि बिना ज्ञान  कहाँ मिलता है 

कैमरे रहते यहाँ अब तो छिपे कक्षों में 
चिपका  दीवार पे कोई  कान कहाँ मिलता  हैं 

जन्म से मृत्यु  तलक  ऋण  से दबा है जीवन 
उसको चिंताओं से परित्राण कहाँ मिलता है 

वह 'भरद्वाज' सदा आती है चुपके चुपके 
मृत्यु के आने  का कुछ भान कहाँ मिलता है 

चंद्रभान  भारद्वाज 

Monday, June 20, 2016


                 यह मर्ज़ी भगवान की
  
उनकी चाहत शीशमहल से आलीशान मकान की
अपनी चाहत शाम सवेरे बस मुट्ठी भर धान की

बिन मौसम आँधी ओले तो फसलें चौपट कर गये
अनब्याही बैठी है स्यानी  बेटी दीन किसान की

धरती पर संकेत नहीं दिखते हैं कोसों दूर तक
कागज पर अंकित हैं सारी बातें पर उत्थान की

एक सनातन प्रश्न खड़ा है फिर कुर्सी के सामने 
कब तक भर पाएगी खाई निर्धन और धनवान की

उसने तो सच के हाथों प्राणों की डोरी सौंप दी
'भारद्वाज' उड़े उड़े अब यह मर्ज़ी भगवान की


(चंद्रभान भारद्वाज)


        यार मिलना है कठिन

 आज दुश्मन तो मिलेंगे यार मिलना है कठिन
मन भरा हो यदि घृणा से प्यार मिलना है कठिन

हर कदम पर चक्रव्यूहों से घिरा जीवन यहाँ
यदि गये अंदर निकासी द्वार मिलना है कठिन

चुभ गया था राह चलते चलते नंगे पाँव में
टीसता है पर वो टूटा खार मिलना है कठिन 

आप यदि इस वक़्त के हाथों की कठपुतली बने
आप  को मन का कोई किरदार मिलना है कठिन

पीटना पड़ता ढिंढोरा अपनी हर उपलब्धि का
वरना श्रीफल शाल या इक हार मिलना है कठिन

भूल बैठी है अगर कोई आँख सपना देखना
कल्पना को फिर कोई आकार मिलना है कठिन

जो उजाले या अंधेरे में अंतर  कर सके
बंधु ऐसी दृष्टि को उजियार मिलना है कठिन

रुख़ हवाओं का बिना देखे उतरतीं धार में
ऐसी नावों को सहज ही पार मिलना है कठिन

यदि पहुँच पाए नहीं उठने से पहले तक वहाँ
आठ दिन से पहले फिर बाज़ार मिलना है कठिन

जल्दबाज़ी में सुबह पूरा पढ़ पाए जिसे
शाम तक वह अधपढ़ा अख़बार मिलना है कठिन

जी रही मुश्किल में 'भारद्वाज' पीढ़ी आज की

नौकरी मिलती नहीं व्यापार मिलना है कठिन

चंद्रभान भारद्वाज 



     और क्या चाहिए

आन है शान है और क्या चाहिए
लोक में मान है और क्या चाहिए

सिर को छत है सुलभ पेट को रोटियाँ
तन को परिधान है और क्या चाहिए

तन तो बलवान है मन दयावान है
चित क्षमावान है और क्या चाहिए

संग अपने ज़माना भले ही हो
संग भगवान है और क्या चाहिए

गाँव के छोर से देश के छोर तक
जान पहचान है और क्या चाहिए

कोई भूखा लौटे कभी द्वार से
प्रभु का वरदान है और क्या चाहिए

यों समस्याएँ आती रहीं सामने
पर समाधान है और क्या चाहिए

घर में आँगन है चौका बगीचा भी है
एक दालान है और क्या चाहिए

कांति चेहरे पे खुशियों की छाई सदा
मुख पे मुस्कान है और क्या चाहिए

आप विद्वद्जनों की सभा में सहज
सबसे पहचान है और क्या चाहिए

जीना अस्सी बरस तक 'भरद्वाज' अब

लगता आसान है और क्या चाहिए   

चंद्रभान भारद्वाज 




बदले तेवर मिले हैं

साधन मिले हैं अवसर मिले हैं
समय के हमें बदले तेवर मिले हैं

मिला है हमें यों तो आकाश सारा
मगर यार कतरे हुए पर मिले हैं

कहा था मिलेगा वहाँ दाना पानी
यहाँ घोसले छोड़ पिंजर मिले हैं

रहे गाँव में तो वहाँ अपना घर था
शहर में मगर लोग बेघर मिले हैं

बनाने चले हैं शहर को वो सुंदर
उजड़ती दुकाने ढहे घर मिले हैं
 
मेरे आम का पेड़ फलने लगा जब
मेरे घर में पत्थर ही पत्थर मिले हैं

सदा जिनसे चाहा था बच कर निकलना
हमें बीच रस्ते में अक्सर मिले हैं

जाने कहाँ हैं वो दिन अपने अच्छे
ये हालात तो बद से बदतर मिले हैं

शिकायत भी करते 'भरद्वाज' किससे

बाबू मिले हैं अफ़सर मिले हैं  

चंद्रभान भारद्वाज