Friday, February 20, 2009

करवटों का हिसाब रखना

नीद की इक किताब रखना;
करवटों का हिसाब रखना।

पत्थरों का मिजाज़ पढ़ना,
हाथ में फ़िर गुलाब रखना।

हर डगर में सवाल होंगे,
हर कदम पर जवाब रखना।

धड़कनों में जूनून कोई,
साँस में इन्कलाब रखना।

आग रखना जली जिगर में,
आँख झेलम चनाब रखना।

वक्त सबको सिखा रहा है,
बस जड़ों में तेजाब रखना।

छोड़ अब 'भारद्वाज' अपने,
चेहरे पर नकाब रखना।

चंद्रभान भारद्वाज

Sunday, February 15, 2009

ऊंची उड़ानों के लिए

पंख ही काफ़ी नहीं हैं आसमानों के लिए;
हौसला भी चाहिए ऊंची उड़ानों के लिए।

गाड़ने हैं जो फसल की चौकसी को खेत में,
चाहिए मजबूत खंभे उन मचानों के लिए।

रोक रक्खी है नदी की धार ऊपर ही कहीं,
है कुदाली की जरूरत अब मुहानों के लिए।

भीग जाती थी पलक सुनकर धुनें जिनकी कभी,
आँख में पानी कहाँ अब उन तरानों के लिए।

तख्त फाँसी का महज इक खेल का मैदान था,
लक्ष्य आज़ादी रहा था जिन दिवानों के लिए।

बन गई है देशसेवा चीज अब बाज़ार की,
लग रहीं हैं बोलियाँ निशदिन दुकानों के लिए।

भूख 'भारद्वाज' आकर फँस गई है जाल में,
घोंसले से तो चली थी चार दानों के लिए।

चंद्रभान भारद्वाज