Friday, November 28, 2008

आख़िर कब तलक

पीढियां ढोती रहें अभिशाप आख़िर कब तलक;
मंत्र सब उलटे पढोगे आप आख़िर कब तलक।

हर शपथ ली जा रही झूठी सरासर जब यहाँ,
हाथ गीता पर धरें चुपचाप आख़िर कब तलक।

ठोंक कर बैठा हुआ है वक्त कीलें पांव में ,
थिरकनें दे ढोलकों की थाप आख़िर कब तलक।

हक हड़प कर मंच पर बैठे हुए जो शान से,
यह सदी माने उन्हें माँ बाप आख़िर कब तलक।

भूत का अहसास देगी बंद कमरों में हमें,
सीढियां चढ़ती हुई पदचाप आख़िर कब तलक।

जब बदलते द्रष्टि के हर रोज पैमाने यहाँ,
ठीक उतरे आदमी का माप आख़िर कब तलक।

चेहरे पर और कालिख पोतवायेगा अभी-
कोख में पलता हुआ यह पाप आख़िर कब तलक।

क्या नपुंसक ही पधारे हैं स्वयंवर में सभी,
बिन प्रत्यंचा के रहेगा चाप आख़िर कब तलक।

आदमी अब सिर्फ़ 'भारद्वाज' आहुति होम की,
पूर्ण होगा कुर्सियों का जाप आख़िर कब तलक।

चंद्रभान भारद्वाज

Wednesday, November 26, 2008

अपना पराया क्या.

हुआ मन साधु का डेरा यहाँ अपना पराया क्या;
समर्पण कर दिया उसको जगत की मोह माया क्या।

धरा आकाश हैं आँगन खिलौना हैं सभी उसके,
सितारे चाँद सूरज आग पानी धूप छाया क्या।

बचाले लाख नज़रों से छिपाले लाख परदों में,
उसे मालूम है तुमने दुराया क्या चुराया क्या.

लिखे हैं ज़िन्दगी ने झूठ के सारे बहीखाते,
बताती है मगर सच मौत खोया और पाया क्या।

नज़र की सिर्फ़ चाहत है मिले दीदार प्रियतम का,
कहाँ है होश अब इतना पिया क्या और खाया क्या।

धधकती प्यार की इस आग में जब कूदकर निकले,
निखर कर हो गए कंचन हमें उसने तपाया क्या।

खड़ा जो बेच कर ईमान 'भारद्वाज' पूछो तो,
कि उसने आत्मा के नाम जोड़ा क्या घटाया क्या।

चंद्रभान भारद्वाज

Sunday, November 23, 2008

बिजलियों पर लिखूं.

वक्त कहता कि कुछ बिजलियों पर लिखूं;
पंख नोंची हुईं तितलियों पर लिखूं।

सर्जनारत भले ही रहें अनलिखी,
खून में पर सनी उँगलियों पर लिखूं।

कुछ लिखूं भूख पर कुछ लिखूं प्यास पर,
चाकुओं से गुदी पसलियों पर लिखूं।

भ्रम फुहारों का देकर न बरसीं कभी,
उन हवा में उड़ी बदलियों पर लिखूं।

जाल सम्बन्ध जिनसे निभाता रहा,
ताल की उन बड़ी मछलियों पर लिखूं।

हो गई बंद जिनके सुरों की खनक,
आज गूंगी पड़ी कजलियों पर लिखूं।

जो पड़ी हैं कबाडे के इक ढेर में,
खिन्न उन चर्खियों तकलियों पर लिखूं।

चंद्रभान भारद्वाज

Tuesday, November 18, 2008

देखली

प्यार की हर कसम तोड़ कर देख ली;
प्रीति छूटी नहीं छोड़ कर देख ली।

एक अहसास पीछा नहीं छोड़ता,
ज़िन्दगी हर तरफ़ मोड़ कर देख ली।

अब पलक पर बने अक्श मिटते नहीं,
मूर्ति पहली गढ़ी तोड़ कर देख ली।

रेशमी डोर की टाट के छोर से,
गांठ जुड़ती नहीं जोड़ कर देख ली।

पाँव बाहर कभी सिर कभी रह गया,
तंग चादर बहुत ओढ़ कर देख ली।

याद चक्कर लगाती वहीँ रातदिन,
वह पुरानी गली छोड़ कर देख ली।

दर्द की इक खनक के सिवा कुछ नहीं,
प्रेम गुल्लक भरी फोड़ कर देख ली।

चंद्रभान भारद्वाज

कभी आना.

अँधेरी रात में द्युतिमान बनकर भी कभी आना;
हमारे स्वप्न में मेहमान बनकर भी कभी आना।

पलक पर आंसुओं की बूँद बनकर तो बहुत आए,
अधर पर इक मधुर मुस्कान बनकर भी कभी आना।

न कुछ शिकवा शिकायत हो न कुछ लानत मलामत हो,
महज़ मनुहार का इक पान बनकर भी कभी आना।

अभी हर ओर रिश्तों में घुला है सिर्फ़ कडुआपन,
दिवाली ईद के पकवान बनकर भी कभी आना।

तुम्हारे पाँव की आहट तलक पहचानते हैं हम,
हमारे द्वार पर अनजान बनकर भी कभी आना।

दुखों के गीत गा गा कर हँसी का अर्थ ही भूले,
सुरीली बांसुरी की तान बनकर भी कभी आना।

तुम्हारा नाम 'भारद्वाज' शामिल देवताओं में,
हमारे बीच इक इंसान बनकर भी कभी आना।

चंद्रभान भारद्वाज

Monday, November 17, 2008

रिश्ते भुनाना जानता है.

उसे सारा ज़माना जानता है,
कि वह रिश्ते भुनाना जानता है।

बिछाकर जाल दाने डालता फ़िर,
बड़ी चिडिया फंसाना जानता है।

रखेगा हाथ बस दुखती रगों पर,
निगाहों में गिराना जानता है।

कहाँ से फेंकना पाशे घुमाकर,
कहाँ गोटी बिठाना जानता है।

झुकाकर पीठ कन्धा आदमी के,
उसे सीढ़ी बनाना जानता है।

हुए सब कारनामे जब उजागर,
महज़ गरदन झुकाना जानता है।

वो 'भारद्वाज' लम्बी हांकता है,
हवा में घर बनाना जानता है।

चंद्रभान भारद्वाज

Saturday, November 15, 2008

एक आहट आपकी

धड़कनें दिल की बढाती एक आहट आपकी;
ज़िन्दगी को जगमगाती मुस्कराहट आपकी।

सुर जगाती घुंघरुओं के और थिरकन पांव की,
घोलती दालान में रस गुनगुनाहट आपकी।

कह रही है आज एलोरा अजंता की कथा ,
शिल्प का अद्भुत नमूना है बनावट आपकी।

डूब जाता मन निराशा के तिमिर में जब कभी,
आस की इक लौ जगाती चुलबुलाहट आपकी।

हाल इक टूटे हुए दिल का सुनाने के लिए,
जोहता है एक युग से बाट पनघट आपकी।

मंदिरों के गर्भगृह में घंटियाँ सी बज उठें,
गूंजती माहौल में जब खिलखिलाहट आपकी।

देख कर नज़रें ज़माने की ज़रा निकला करो,
चैन 'भारद्वाज' का हरती सजावट आपकी।

चंद्रभान भारद्वाज

Wednesday, November 12, 2008

अच्छी लगी

हर सुबह अच्छी लगी हर शाम भी अच्छी लगी;
आप से परिचय हुआ तो ज़िन्दगी अच्छी लगी।

संग पाकर आपका लगने लगा मौसम भला,
चाँदनी तो चाँदनी अब धूप भी अच्छी लगी।

आप आकार बस गए जबसे हमारे गाँव में,
वह मोहल्ला वह तिराहा वह गली अच्छी लगी।

एक अरसे बाद रक्खा था जलाकर इक दिया,
आप आए तो दिए की रोशनी अच्छी लगी।

रूप है पर रूप का अभिमान किंचित भी नही
सच कहें तो आपकी यह सादगी अच्छी लगी।

आँख काज़ल भाल बिंदी हाथ मेहदी हो न हो।
आपकी सूरत बिना श्रंगार भी अच्छी लगी।

मंच पर पढ़ते समय जब दाद पाई आपकी,
यार 'भारद्वाज' अपनी शायरी अच्छी लगी।

चंद्रभान भारद्वाज.

Saturday, November 8, 2008

नाज़ है तो है

हमारे प्यार पर हमको अगर कुछ नाज़ है तो है;

हमारी भी निगाहों में कहीं मुमताज़ है तो है।

दिया बनकर जले दिनरात उसकी मूर्ति के आगे,

हमारे प्यार का यह सुफिया अंदाज़ है तो है।

उमर इक खूबसूरत मोड़ पर दिल छोड़ आयी थी,

धड़कनों में उसी की गूंजती आवाज़ है तो है।

हमारा प्यार उठती हात का सौदा नहीं कोई,

बंधे अनुबंध में दुनिया अगर नाराज़ है तो है।

खुली है ज़िन्दगी अपनी कहीं परदा नहीं कोई,

अंगूठी में अगर उसका दिया पुखराज है तो है।

हमारे प्यार का आधार बालू का घरोंदा था,

हमारी आँख में वह आज तक भी ताज है तो है।

न तो समझा रदीफों को न समझे काफिये हमने,

ग़ज़ल में पर हमारा नाम 'भारद्वाज' है तो है।

चंद्रभान भारद्वाज