Saturday, January 31, 2009

तनिक हिस्सा बना लेते

हृदय की राजधानी का तनिक हिस्सा बना लेते;
हमें अपनी कहानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

हवायें रुख बदल लेतीं ज़माना साथ हो लेता,
नज़र की मेहरबानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

उतरती आस की तितली चमकते प्यार के जुगनू,
अगर खिलती जवानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

गमों का बोझ कंधों पर बहुत आसान हो जाता,
कभी टूटी कमानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

कहीं तसवीर बनबाते कहीं इक नाम गुदवाते,
प्रणय की इक निशानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

जहाँ से भी गुजर जाते हवा में फैलती खुशबू,
बदन की रातरानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

बदल कर धार 'भारद्वाज' आवारा नही होते,
अगर चंचल रवानी का तनिक हिस्सा बना लेते।

चंद॒भान भारद्वाज

Thursday, January 29, 2009

रंग कब भरने दिया

कल्पनाओं में सुनहरा रंग कब भरने दिया;
कामनाओं को यहाँ उन्मुक्त कब उड़ने दिया।

चाहते थे ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी ही छीन ली,
मौत चाही तो सहज सी मौत कब मरने दिया।

खूबियों के साथ में कुछ खामियाँ भी बाँध दीं,
खामियों को खूबियों से दूर कब करने दिया।

पार कर मझधार कश्ती तो किनारे लग गई,
पर किनारों ने कहीं भी पाँव कब धरने दिया।

गर्द ने धुँधला दिया जो चित्र बीते वक्त का,
पुत गई दीवार तो वह चित्र कब टँगने दिया।

आँसुओं का कर्ज ही केवल वसीयत में मिला,
किश्त तो भरते रहे पर मूल कब घटने दिया।

घेर 'भारद्वाज' बैठा हर दिशा हर रास्ता,
कोहरे ने सूर्य का रथचक्र कब बढ़ने दिया।

चंद॒भान भारद्वाज

Monday, January 26, 2009

२६,जनवरी - गणतंत्र दिवस पर विशेष - 'प्रणाम'

सरहदों पर डट रहे बांके युवाओं को प्रणाम;
देश पर जो बलि चढ़ीं उन आत्माओं को प्रणाम।

काट कर टुकड़ा जिगर का सौंपतीं जो देश को,
उन बहादुर बेटिओं को और माँओं को प्रणाम।

अंदरूनी मोर्चों पर जो सदा मुस्तैद हैं,
खेत की कल-कारखानों की भुजाओं को प्रणाम।

चीर कर सीना अँधेरी रात का जो आ रहीं,
भोर की उन दिव्य स्वर्णिम लालिमाओं को प्रणाम।

घोलतीं वातावरण में जो सुबह से ही मिठास,
शब्द गुरवानी अजानों प्रार्थनाओं को प्राणाम।

सूर्य की पहली किरण के संग जो हंसते सदा,
पेड़-पौधों फूल-पत्तों वन-लताओं को प्रणाम।

स्वप्न जो हर आँख का साकार करने में लगीं,
उन व्यवस्थाओं समितिओं संस्थाओं को प्रणाम।

जा रहे हैं गर्त में पथभ्रष्ट हो क़र जो कदम,
मांगतीं उन को सुमति उन सब दुआओं को प्रणाम।

हो गए कमजोर कंधे ढो रहे पर बोझ को,
खीजते जनतंत्र के उन चार पाओं को प्रणाम।

गर्म करने में लगी हैं जो शिराओं का लहू,
गीत की संगीत की सारी विधाओं को प्रणाम।

नित सुनहरे रंग 'भारद्वाज' क्षितिजों में भरें,
उन उंगलिओं और कलमों तूलिकाओं को प्रणाम।

चंद्रभान भारद्वाज

Tuesday, January 20, 2009

देखे

कमजोर पत्थर के बने आधार भी देखे,
ढहते हुए पुख्ता दरो-दीवार भी देखे।

ढलता न था सूरज जहाँ होती न थीं रातें,
मिटते हुए वे राज वे दरबार भी देखे।

जकड़े हुए थे प्यार की जंजीर में युग से,
इस दौर में वे टूटते परिवार भी देखे।

बाजार सब को तौलता है अब तराजू में,
फन बेचते अपना यहाँ फनकार भी देखे।

सम्मान होना था शहीदों देश-भक्तों का,
पर मंच पर बैठे हुए गद्दार भी देखे।

जो एक मृग-तृष्णा लिये बस भागती फिरती,
इस ज़िन्दगी के टूटते एतबार भी देखे।

सूखी टहनियों पर बने थे दाग पत्थर के,
उजड़े चमन ने पेड़ वे फलदार भी देखे।

लौटा शहर से गाँव तो भीगी पलक देखीं,
यादें खड़ी थीं मौन वे घर-बार भी देखे।

यह प्यार 'भारद्वाज' सदियों की कहानी है,
छलते इस इकरार भी इनकार भी देखे।

चंद॒भान भारद्वाज

Sunday, January 18, 2009

देखते हैं

तनिक सरहदें लाँघ कर देखते हैं;
उधर की हवा झाँक कर देखते हैं।

मरीं हैं कि जिन्दा हैं संवॅदनाऍं ,
कहीं लाश इक टाँग कर देखते हैं।

खुली लाश मरघट तलक क्या उठाऍं,
किसी से कफन मांग कर देखते हैं।

पटी खाइयाँ या हुईं और चौड़ी ,
इधर से उधर फाँद कर देखते हैं।

किनारे कहाँ तक सँभालॅ रखेंगे,
उफनती नदी बाँध कर देखते हैं।

समय ने हमें सिर्फ रॅवड़ बनाया,
सभी हर तरफ हाँक कर देखते हैं।

'भारद्वाज' है प्रेम किसको वतन से,
चलो एक सर माँग कर देखते हैं।

चंद॒भान भारद्वाज

Tuesday, January 13, 2009

आने लगीं

जब फसल में फूल फलियाँ बालियाँ आने लगीं;
खेत में चारों तरफ से टिड्डियाँ आने लगीं।

आम का इक पेड़ आंगन में लगाया था कभी,
पत्थरों से घर भरा जब आमियाँ आने लगीं।

जब कली से फूल बनने की क्रिया पूरी हुई,
डाल पर तब तितलियाँ मधुमक्खियाँ आने लगीं।

भागतीं फिरतीं रहीं कल तक उमर से बेखबर ,
उन लड़कियों के गले में चुन्नियाँ आने लगीं।

ज़िन्दगी को आ गया सजने संवरने का हुनर,
पायलें झुमके नथनियाँ चूड़ियां आने लगीं।

जिन घरों में शादियों की बात पक्की हो गई,
देख कर शुभ लग्न पीली पातियाँ आने लगीं।

हो रहे हालात बदतर डाकघर के दिन-ब-दिन,
आजकल ई-मेल से सब चिट्ठियाँ आने लगीं।

याद आई गाँव की परदेशियों को जिस घड़ी ,
दफ्तरों में छुट्टियों की अर्जियाँ आने लगीं।

पढ़ जिन्हें झुकतीं निगाहें आज 'भारद्वाज' खुद,
रोज अब अखबार में वे सुर्खियाँ आने लगीं।

चंद॒भान भारद्वाज

Thursday, January 8, 2009

देकर गया

मानता था मन सगा जिसको दगा देकर गया;
प्यार अक्सर ज़िन्दगी को इक सज़ा देकर गया।

दर्द जब कुछ कम हुआ जब दाग कुछ मिटने लगे,
घाव फ़िर कोई न कोई वह नया देकर गया।

जानता था खेलना अच्छा नहीं है आग से,
पर दबी चिनगारियों को वह हवा देकर गया।

याद आता है उमर भर प्यार का वह एक पल,
जो उमर को आंसुओं का सिलसिला देकर गया।

आंसुओं में डूब कर भी ढूंढ लेते हैं हँसी
प्रेमियों को वक्त यह कैसी कला देकर गया।

द्वार सारे बंद थे सब खिड़कियाँ भी बंद थीं,
पर समय कोई न कोई रास्ता देकर गया।

हम कभी बदले स्वयं वातावरण बदला कभी,
दर्द ऐसे में खुशी का सा मज़ा देकर गया।

चंद्रभान भारद्वाज

Wednesday, January 7, 2009

रखना

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

आँख में आसमान रखना;
एक ऊंची उड़ान रखना।

पत्थरों का मिजाज़ पढ़कर,
ठोकरों का गुमान रखना।

सिर्फ़ छू कर न लौट आना,
चोटियों पर निशान रखना।

गिद्ध नज़रें लगीं फसल पर,
खेत में इक मचान रखना।

मंजिलों पर नज़र गडा़ कर,
हौसलों को जवान रखना।

ज्ञान रखना हरिक दवा का,
रोग का भी निदान रखना।

हाथ 'भारद्वाज' माचिस,
गाँव को सावधान रखना।

चंद्रभान भारद्वाज

Monday, January 5, 2009

बर्फ पिघली और पानी हो गई,

वृद्ध असमय ही जवानी हो गई;
ज़िन्दगी किस्सा कहानी हो गई।

रेत बनकर रह गई बहती नदी,
और जड़ चंचल रवानी हो गई।

वक्त का हर बोझ कन्धों पर लदा,
उम्र झुक झुक कर कमानी हो गई।

खाद पानी या हवा का है असर,
कैक्टस सी रातरानी हो गई।

रात करवट और दिन उलझन हुए,
एक बेटी जब सयानी हो गई।

बात परदे में ढंकी शालीन थी,
खुल गई तो छेड़खानी हो गई।

आपने दुखती रगों को जब छुआ,
पीर भी कितनी सुहानी हो गई।

जो न आई होंठ तक संकोचवश,
बात आंखों की जबानी हो गई।

देख 'भारद्वाज' नज़रों का कमाल,
बर्फ पिघली और पानी हो गई।

चंद्रभान भारद्वाज