Monday, October 31, 2011

तलवार के पीछे

खूनी कथाएं लिख रहीं तलवार के पीछे 
दफना दिया हर राज़ पर अखबार के पीछे 

उम्मीद रक्खोगे बता क्या न्याय की उनसे 
जो खुद खड़े हैं आज गुनाहगार के पीछे 

ऊपर से देखेंगे अगर तो दिख नहीं पाता
अंदर छिपा है स्वार्थ हर उपकार के पीछे 

लगता अकेला सा अकेला है नहीं लेकिन 
इक दर्द रहता है सदा फनकार के पीछे 

रहता हँसाता भीड़ को जो रोज परदे पर
है आँसुओं की बाढ़ उस किरदार के पीछे 

लग तो रहा है चैन से बैठा हुआ होगा 
पर भग रहा है आदमी कलदार के पीछे 

सडकों पे आकर खुद पलट देती है अब तख्ता 
पड़ती है जब जनता किसी  सरकार के पीछे 

तकदीर में अक्सर भलाई के लिखीं चोटें 
है पत्थरों का ढेर हर फलदार के पीछे 

कोई सदी या सभ्यता कोई हो 'भारद्वाज' 
होते रहे हैं हादसे हर प्यार के पीछे

चंद्रभान भारद्वाज

Wednesday, October 19, 2011

फँस गये

कुछ सुबह और कुछ शाम में फँस गये

हर सड़क पर लगे जाम में फँस गये


कर के अपराध कुछ लोग चलते बने
कुछ किए बिन ही इल्ज़ाम में फँस गये


रीढ़ की चोट खा कर के बैठे हैं अब
संगमरमर के हम्माम में फँस गये


प्यार का यार आगाज़ तो था भला
पर कसकते से अंजाम में फँस गये


उसकी सूरत थी कुछ और सीरत थी कुछ
इक अजनबी के बस नाम में फँस गये


एक के मोल में दूसरा मुफ़्त था
अब लगा जैसे कम दाम में फँस गये


काम घर का न कोई भी निपटा सके
ऐसे दफ़्तर के इक काम में फँस गये


दर्शनों को गये जब अमरनाथ के
घर से चल कर पहलगाम में फँस गये


एक भगदड़ 'भरद्वाज' चारों तरफ
शांति के शब्द कोहराम में फँस गये


चंद्रभान भारद्वाज