Tuesday, September 15, 2009

नदी प्यार की

तन के आँगन में वर्षा हुई प्यार की;
मन में बहने लगी इक नदी प्यार की।

चार पल ही बिताये कभी साथ में,
लगता जी ली हो पूरी सदी प्यार की।

स्वाद अब और कोई सुहाता नहीं,
जब से प्राणों ने बूटी चखी प्यार की।

घुल गई है हवाओं में चारों तरफ़,
ऐसी साँसों में खुशबू भरी प्यार की।

ज़िन्दगी में अँधेरे रहे ही नहीं,
देख ली है नई रोशनी प्यार की।

कोरे मन पर उभरते रहे शेर सब,
जब नज़र ने ग़ज़ल इक लिखी प्यार की।

कामनाओं का वन लहलहाने लगा,
मिल गई जब जड़ों को नमी प्यार की।

वह समझने लगा बादशाहत मिली,
जिसको भी मिल गई इक कनी प्यार की।

टीस बन कर उभरती रहे उम्र भर,
हो 'भरद्वाज' यदि इक कमी प्यार की।

चंद्रभान भारद्वाज

Tuesday, September 8, 2009

साधनाओं में तुम

हो हवाओं में तुम सब दिशाओं में तुम;
रम रहीं मेरे मन की गुफाओं में तुम।

झांकता हूँ शरद रात्रि में जब गगन,
दीखतीं चंद्रमा की कलाओं में तुम।

हो गया है निगाहों में कैसा असर,
मुझको लगती हो जलती शमाओं में तुम।

मैंने लिखने को जब भी उठाई कलम,
गीत ग़ज़लों में प्रहसन कथाओं में तुम।

जब भी मन्दिर में जाकर झुकाया है सिर,
मेरी माँगी हुई सब दुआओं में तुम।

पढ़ के देखा है वेदों पुराणों को भी,
वेदवाणी में तुम हो ऋचाओं में तुम।

जंगलों से गुजरते समय यों लगा,
पेड़ के संग लिपटी लताओं में तुम।

मेरे प्राणों में साँसों उसासों में ख़ुद,
खून बन बहतीं मेरी शिराओं में तुम।

ध्यान करते समय भी 'भरद्वाज' की,
भावनाओं में तुम साधनाओं में तुम।

चंद्रभान भारद्वाज

Wednesday, September 2, 2009

सपने दिखा प्यार के

चल दिया कोई सपने दिखा प्यार के;
सूझता है न अब कुछ सिवा प्यार के।

आह आंसू तड़प हिचकियाँ सिसकियाँ,
दर्द बदले में केवल मिला प्यार के।

क्यों न जाने ज़माने की बदली नज़र,
जबसे खुद को हवाले किया प्यार के।

मोतियों की लड़ॊं से सजी हो भले,
अर्थ क्या ज़िन्दगी का बिना प्यार के।

तुमको कांटों भरी सब मिलीं हों भले,
फूल राहों में सब की बिछा प्यार के।

जो घृणा के अंधेरों में भटके हुए,
कुछ उजाले भी उनको दिखा प्यार के।

मोल अनमोल था जिस 'भरद्वाज' का,
मुफ़्त बाजार में वह बिका प्यार के।

चंद्रभान भारद्वाज