Sunday, March 14, 2010

घर को घर क्या कहें

ईंट पत्थर का है घर को घर क्या कहें
इक अकेले   सफ़र को सफ़र   क्या कहें

कोई   आहट   नहीं   कोई दस्तक   नहीं
बिन प्रतीक्षा रहे दर को दर क्या कहें

जो   तरसता रहा   प्यार की बूँद   को
एक प्यासे अधर को अधर क्या कहें

देख कर   भी   लगे   जैसे   देखा   नहीं
उस  उचटती नज़र को नज़र क्या कहें  

जिसमें जीने का जज्बा बचा ही नहीं
ऐसे मुर्दा जिगर को जिगर क्या कहें

कुछ दिशा का पता है न मंजिल पता
इक भटकते बशर को बशर क्या कहें

छोड़ हमको किनारे पे खुद मिट गई
उस उफनती लहर को लहर क्या कहें

जिसकी गलियों में यादें दफ़न हो गईं
ऐसे   बेदिल शहर को शहर   क्या कहें

जो   कटी है   'भरद्वाज'   प्रिय के बिना
उस अभागिन उमर को उमर  क्या कहें

चंद्रभान भारद्वाज

7 comments:

HARI SHARMA said...

bahut sundar alfaaz

वन्दना said...

hamesha ek alag hi andaz hota hai.........gazab ki prastuti.

इस्मत ज़ैदी said...

आदरणीय ,

ईंट पत्थर का है घर को घर क्या कहें
इक अकेले सफ़र को सफ़र क्या कहें

बहुत ख़ूब

Udan Tashtari said...

ईंट पत्थर का है घर को घर क्या कहें
इक अकेले सफ़र को सफ़र क्या कहें

-वाह!! क्या कहने!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

कुछ दिशा का पता है न मंजिल पता
इक भटकते बशर को बशर क्या कहें
आदरणीय भारद्वाज जी, हर शेर लाजवाब है...

वन्दना अवस्थी दुबे said...

श्रद्धेय

जिसमें जीने का जज्बा बचा ही नहीं
ऐसे मुर्दा जिगर को जिगर क्या कहें
बहुत ही सुन्दर गज़ल.

नीरज गोस्वामी said...

हमेशा की तरह लाजवाब ग़ज़ल...
नीरज