Tuesday, November 18, 2008

कभी आना.

अँधेरी रात में द्युतिमान बनकर भी कभी आना;
हमारे स्वप्न में मेहमान बनकर भी कभी आना।

पलक पर आंसुओं की बूँद बनकर तो बहुत आए,
अधर पर इक मधुर मुस्कान बनकर भी कभी आना।

न कुछ शिकवा शिकायत हो न कुछ लानत मलामत हो,
महज़ मनुहार का इक पान बनकर भी कभी आना।

अभी हर ओर रिश्तों में घुला है सिर्फ़ कडुआपन,
दिवाली ईद के पकवान बनकर भी कभी आना।

तुम्हारे पाँव की आहट तलक पहचानते हैं हम,
हमारे द्वार पर अनजान बनकर भी कभी आना।

दुखों के गीत गा गा कर हँसी का अर्थ ही भूले,
सुरीली बांसुरी की तान बनकर भी कभी आना।

तुम्हारा नाम 'भारद्वाज' शामिल देवताओं में,
हमारे बीच इक इंसान बनकर भी कभी आना।

चंद्रभान भारद्वाज

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