Sunday, October 5, 2008

दांव पर हैं.

चेतनाएं दांव पर हैं;
भावनाएं दांव पर हैं

पंगु है साहित्य जग का,
सर्जनाएं दांव पर हैं

मौन मन्दिर और मस्जिद,
प्रार्थनाएं दांव पर हैं

वक्ष पत्थर के हुए सब,
याचनाएं दांव पर हैं

जढ़ हुईं संवेदनाएं,
वेदनाएं दांव पर हैं

आंकडों में फंस गईं सब,
योजनायें दांव पर हैं

ध्यान 'भारद्वाज' कलुषित,
साधनाएं दांव पर हैं

चंद्रभान भारद्वाज.

3 comments:

Ravi Srivastava said...

आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है।
‘…हम तो ज़िन्दा ही आपके प्यार के सहारे है
कैसे आये आपने होंठो से पुकारा ही नही…’’
आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे
बधाई स्वीकारें।
आप मेरे ब्लॉग पर आए, शुक्रिया.
मुझे आप के अमूल्य सुझावों की ज़रूरत पड़ती रहेगी.

...रवि
www.meripatrika.co.cc/
http://mere-khwabon-me.blogspot.com/

chandrabhan bhardwaj said...

Aapne mera blog dekha aur rachanayen parhi unhe saraha bhi yah mujhe bahut achchha laga aapki cumments ne aur likhane ke liye protsahit bhi kiya.Aapki comments ke liye men hardik roop se dhanyavad deta hun.
Chandrabhan Bhardwaj

अनुपम अग्रवाल said...

मौन मन्दिर और मस्जिद,
प्रार्थनाएं दांव पर हैं

वक्ष पत्थर के हुए सब,
याचनाएं दांव पर हैं

जढ़ हुईं संवेदनाएं,
वेदनाएं दांव पर हैं
ज़िंदगी के कई आयामों को एक साथ सशक्त प्रस्तुत करते हुए आपकी रचना .
लिखते रहें