Monday, March 26, 2012

स्वर से स्वर मिला

दूर रहकर ही मिला या पास में आकर मिला 
मीत मन से मन मिला तू और स्वर से स्वर मिला 

आदमी की अस्मिता का प्रश्न है अब सामने 
हैं सभी हैरान पर अब तक कहाँ उत्तर मिला 

दौड़ता था धमनियों में खून जिसके नाम से 
अब उसी की धमनियों में सन्निपाती ज्वर  मिला 

जो बताता था दिशा को और दूरी को कभी 
राह में उखड़ा हुआ वह मील का पत्थर मिला 

सूचना तो यह मिली थी गाँव में बारिश हुई 
खेत इक सूखा मिला पर और इक बंजर मिला 

एक अरसे बाद लौटे जब शहर से गाँव में 
घर मिला फूटा हुआ टूटा हुआ छप्पर मिला 

हो गया लगता है उसके साथ कोई हादसा 
झाड़ियों में मधुमती के पाँव का जेवर मिला 

आ गई सैयाद के चक्कर में शायद फाख्ता 
खून के धब्बे मिले हैं और टूटा पर मिला 

देखता है थालियों में रोज भूखा आदमी 
विष मिला है सब्जियों में दाल में कंकर मिला 

खोजते फिरते थे मंदिर और मस्जिद में जिसे 
बंद कर आँखें निहारा तो वही अन्दर मिला 

हाथ 'भारद्वाज' सारे अपने अपने धो रहे 
बहती गंगा में जिसे जैसा जहाँ अवसर मिला 

चंद्रभान भारद्वाज 

7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29-03 -2012 को यहाँ भी है

.... नयी पुरानी हलचल में ........सब नया नया है

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

देखता है थालियों में रोज भूखा आदमी
विष मिला है सब्जियों में दाल में कंकर मिला

बहुत संवेदनशील लिखा है ...खूबसूरत गजल

Anupama Tripathi said...

एक अरसे बाद लौटे जब शहर से गाँव में
घर मिला फूटा हुआ टूटा हुआ छप्पर मिला
बहुत गहन ...संवेदनशील लेखन ...
बधाई एवं शुभकामनायें ...!!

Rajesh Kumari said...

आ गई सैयाद के चक्कर में शायद फाख्ता
खून के धब्बे मिले हैं और टूटा पर मिला
ek se badhkar ek ashaar..bahut sashaqt ghazal likhi hai aapne.

avanti singh said...

खूबसूरत गजल,अच्छी प्रस्तुति

avanti singh said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!

अख़तर क़िदवाई said...

umda gazal!