Monday, March 19, 2012

देखिये

गुनगुना कर देखिये या मुस्करा कर देखिये
ज़िन्दगी के बोझ को हलका बना कर देखिये 

आपकी भाषा समझते हैं बहुत अच्छी तरह 
फूल-पत्तों को व्यथा अपनी सुना कर देखिये 

इक-न-इक दिन पूर्ण होगी आपकी मन- कामना 
अपने सच्चे मन से कोई प्रार्थना कर देखिये 

धूप में वह छाँह देगा ज़िन्दगी भर आपको 
घर के आँगन में कोई पौधा लगा कर देखिये 

पंख लग जायेंगे सहसा आपके हर स्वप्न को 
रेशमी आँचल का थोड़ा प्यार पाकर देखिये 

ओढ़ना बरसातियों का छतरियों का छोड़ कर
पहली बारिश में कभी नंगा नहा कर देखिये 

देखना आसान हो जायेगा आगे का सफ़र 
यार 'भारद्वाज' को अपना बना कर देखिये 

चंद्रभान भारद्वाज 

9 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत खूब !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत और प्रेरणा देती गजल ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 22/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (संगीता स्वरूप जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Pallavi said...

बहुत ही सुंदर भावों के संयोजन से सुसजित बहुत ही खूबसूरत एवं प्रेरणात्मक प्रस्तुति....

Ramakant Singh said...

ओढ़ना बरसातियों का छतरियों का छोड़ कर
पहली बारिश में कभी नंगा नहा कर देखिये
it looks nice to be in childhood.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

आपकी भाषा समझते हैं बहुत अच्छी तरह
फूल-पत्तों को व्यथा अपनी सुना कर देखिये ...
बहुत खुबसूरत ग़ज़ल...
सादर बधाई.

Dr.Nidhi Tandon said...

बधाई...बढ़िया रचना हेतु,
इक-न-इक दिन पूर्ण होगी आपकी मन- कामना
अपने सच्चे मन से कोई प्रार्थना कर देखिये

सकारात्मक सोच...

Saras said...

आपकी भाषा समझते हैं बहुत अच्छी तरह
फूल-पत्तों को व्यथा अपनी सुना कर देखिये

बहुत खूब !

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

गुनगुना कर देखिये या मुस्करा कर देखिये
ज़िन्दगी के बोझ को हलका बना कर देखिये

आपकी भाषा समझते हैं बहुत अच्छी तरह
फूल-पत्तों को व्यथा अपनी सुना कर देखिये

वाह, आपने मेरी गज़ल याद दिला दी

ज़िंदगी का बोझ हल्का इस तरह होता अरुण
गैर की खुशियों की खातिर, गम उठा के देखिये...