Tuesday, June 25, 2019

साँचों में ढलना आ गया है 

जिसे साँचों में ढलना आ गया है
समय के संग चलना आ गया है 

फँसेगा चक्रव्यूहों में नहीं अब
उसे बाहर निकलना आ गया है

चमकता ही रहेगा हर दिशा में
सतत दीपक सा जलना आ गया है

कहीं गाड़ी नहीं उसकी रुकेगी
सही पटरी बदलना आ गया है

जरुरत अब नहीं बैसाखियों की
कुलाँचें भर उछलना आ गया है

नए अंकुर उगें नस नस में उसकी
जिसे मिटटी में मिलना आ गया है

न उसकी नाव डूबेगी भँवर में
थपेड़ों में सँभलना आ गया है

गुलाबों में उसी की होती गिनती
जिसे काँटों में खिलना आ गया है

न 'भारद्वाज ' की हस्ती मिटेगी
उसे ग़ज़लों में ढलना आ गया है

चंद्रभान भारद्वाज 





No comments: