Thursday, April 19, 2012

कहाँ रही

वह दोस्ती का दौर वह मस्ती कहाँ रही 
गुलज़ार थी दिन-रात वह बस्ती कहाँ रही 

तूफ़ान की परवाह थी न आँधियों का डर
बारिश का पानी कागजी कश्ती कहाँ रही 

जिसके इशारे पर बदलती रुख सदा हवा 
दरबार का वह रौब वह हस्ती कहाँ रही  

कन्धों पे ज़िन्दगी की जिम्मेदारियाँ लदीं
बेफिक्र अल्हड़पन मटरगश्ती कहाँ रही 


फिरका परस्ती भी रही है बुत परस्ती भी 
लेकिन कभी इंसान परस्ती कहाँ रही 

छत की खबर कोई न कोई दाल-रोटी की 
इस ज़िंदगी को  साँस भी सस्ती कहाँ रही  

बस्तों ने छीना आज  'भारद्वाज' बालपन 
वह बालहट वह जोर-जबरदस्ती कहाँ रही

चंद्रभान भारद्वाज 

4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूब ...

नीरज गोस्वामी said...

सुभान अल्लाह...एक एक शेर तराशा हुआ नगीना है...दाद कबूलें

नीरज

chandrabhan bhardwaj said...

bhai neeraj goswami ji
smt. sangeeta swaroop(geet)ji
namaskar aapki comments ke liye bahut bahut dhanyawad inse khoob protsahan milata hai.

singhSDM said...

भारद्वाज जी
अच्छी ग़ज़ल .....ये दो शेर ज़िन्दगी की सच्चाइयों को किस खूबसूरती से बयाँ कर गए.... !

तूफ़ान की परवाह थी न आँधियों का डर
बारिश का पानी कागजी कश्ती कहाँ रही

कन्धों पे ज़िन्दगी की जिम्मेदारियाँ लदीं
बेफिक्र अल्हड़पन मटरगश्ती कहाँ रही