Tuesday, February 28, 2012

समझ बैठे

डगर में रजकणों को मील का पत्थर समझ बैठे 
टिके बैसाखियों पर जो उन्हें गिरवर समझ बैठे 

खरीदे  मंच  के  आगे  खरीदीं  तालियाँ  सारी
खरीदी भीड़ को ही आमजन का स्वर समझ बैठे 

नज़र के सामने फैला हुआ था दूर तक मरुथल 
मगर हम प्यास के मारे उसे निर्झर समझ बैठे 

न तो आकाश है उनका न धरती ही कहीं उनकी 
खुले फुटपाथ को वे लोग अपना घर समझ बैठे 

स्वयं ही मारकर पत्थर हरिक दर्पण को तोडा है 
बिना दर्पण वो अपना चेहरा सुंदर समझ बैठे 

किया है झिलमिलाती रोशनी ने इस कदर अंधा
चमकते काँच के टुकड़ों को हम गौहर समझ बैठे 

हुई  है  दूर  'भारद्वाज'  भूखे  पेट  से  रोटी
बड़े बाजार को पर हम प्रगति की दर समझ बैठे 

चंद्रभान भारद्वाज  

4 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

खरीदे मंच के आगे खरीदीं तालियाँ सारी
खरीदी भीड़ को ही आमजन कर स्वर समझ बैठे

क्या बात है सर !
बिल्कुल सच कहा आपने

वन्दना said...

खरीदे मंच के आगे खरीदीं तालियाँ सारी
खरीदी भीड़ को ही आमजन कर स्वर समझ बैठे

नज़र के सामने फैला हुआ था दूर तक मरुथल
मगर हम प्यास के मारे उसे निर्झर समझ बैठे
हकीकत बयाँ कर दी हमेशा की तरह हर शेर लाजवाब्।

Aditya said...

न तो आकाश है उनका न धरती ही कहीं उनकी
खुले फुटपाथ को वे लोग अपना घर समझ बैठे

gazab sirji gazab..

kabhi waqt mile to mere blog par bhi aaiyega..

palchhin-aditya.blogspot.in

chandrabhan bhardwaj said...

Ismat ji, Vandana ji aur bhai Aditya ji apne ghazal padhi apko achchhi lagi aur apne us par apne comments diye iske liye main aabhari hoon.Apki tippadiyon se bahut protsahan milata hai. Dhanywaad.