Wednesday, February 22, 2012

कातिल नहीं पाया


इक खून का कोई कहीं हासिल नहीं पाया 
चाकू नहीं पाया कभी कातिल नहीं पाया 

जो जुर्म में शामिल थे वे छूटे हुए बाहर 
जो कैद है वह जुर्म में शामिल नहीं पाया 

इंसान  तो  मजबूर  है  क़ानून  है  अंधा
जो वाद को अंजाम दे वह दिल नहीं पाया 

आया  हुआ  है रास्ते  के बीच  जो पत्थर 
चाहा हटाना पर जरा भी हिल नहीं पाया 

डस करअचानक हो गया है आँख से ओझल 
जिसमें छिपा है साँप का वह बिल नहीं पाया 

काँटों में फँस कर फट गया है रेशमी आँचल 
उलझा हुआ हर तार ऐसा सिल नहीं पाया 

हालात कैसे कर गया है बाग़ का मौसम 
सूखा नहीं पर फूल कोई खिल नहीं पाया  

बैठे  हुए  हैं  लोग  ऐसे  मंच  के   ऊपर  
जिनको दरी के भी कभी काबिल नहीं पाया 

कश्ती उतारी तो है 'भारद्वाज' सागर में 
कोई अभी तक राह या साहिल नहीं पाया 

चंद्रभान भारद्वाज 

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