Wednesday, October 19, 2011

फँस गये

कुछ सुबह और कुछ शाम में फँस गये

हर सड़क पर लगे जाम में फँस गये


कर के अपराध कुछ लोग चलते बने
कुछ किए बिन ही इल्ज़ाम में फँस गये


रीढ़ की चोट खा कर के बैठे हैं अब
संगमरमर के हम्माम में फँस गये


प्यार का यार आगाज़ तो था भला
पर कसकते से अंजाम में फँस गये


उसकी सूरत थी कुछ और सीरत थी कुछ
इक अजनबी के बस नाम में फँस गये


एक के मोल में दूसरा मुफ़्त था
अब लगा जैसे कम दाम में फँस गये


काम घर का न कोई भी निपटा सके
ऐसे दफ़्तर के इक काम में फँस गये


दर्शनों को गये जब अमरनाथ के
घर से चल कर पहलगाम में फँस गये


एक भगदड़ 'भरद्वाज' चारों तरफ
शांति के शब्द कोहराम में फँस गये


चंद्रभान भारद्वाज





7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

प्यार का यार आगाज़ तो था भला
पर कसकते से अंजाम में फँस गये


उसकी सूरत थी कुछ और सीरत थी कुछ
इक अजनबी के बस नाम में फँस गये


बहुत सुन्दर गज़ल ...

वन्दना said...

बहुत ही खूबसूरत गज़ल है……………हर शेर लाजवाब्।

नीरज गोस्वामी said...

बिलकुल अलग रंग बिखेरती इस अद्भुत व्यंग्यात्मक ग़ज़ल के लिए दिली दाद कबूल करें

नीरज

chandrabhan bhardwaj said...

Sangeeta ji, Vandana ji avam
Bhai Neeraj ji,
Aapne meri ghazal padhi aur wah aapko achchhi lagi, aapne us par apne comments diye iske liye main aap ka hriday se aabhari hoon.

'साहिल' said...

वाह! क्या शेर कहा है!

रीढ़ की चोट खा कर के बैठे हैं अब
संगमरमर के हम्माम में फँस गये


एक अलग रंग मैं रंगी है ये ग़ज़ल! बहुत ही खूबसूरत!
काफिया और रदीफ़ भी नायाब लगे!

संगीता पुरी said...

बहुत खूब !!

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

शुभ दीपावली,