Friday, March 18, 2011

वो राख में सुलगती इक आग ढूँढ़ते हैं

पानी में दूध जैसे ही झाग ढूँढ़ते हैं
वो राख में सुलगती इक आग ढूँढ़ते हैं

फूलों की क्यारियाँ तो रख़ दीं उजाड़ कर सब
काँटों की झाड़ियों में वो पराग ढूँढ़ते हैं 

खेलों में खोया बचपन  रंगरेलियों में यौवन  
अब आखिरी क्षणों में वैराग ढूँढ़ते हैं

आदी हैं हाथ जिसके बन्दूक बम छुरों के
पत्थर के उस ह्रदय में अनुराग ढूँढ़ते हैं 

उम्मीद क्या करें अब इंसानियत की उनसे  
जो ह़र लहू के कतरे में फाग ढूँढ़ते हैं

रक्खे थे  जिंदगी भर माँ-बाप आश्रमों में 
करने को श्राद्ध उनका अब काग ढूँढ़ते हैं

पूरी रँगी हुई है कालिख से खुद की चादर
औरों की साफ़ चादर में दाग ढूँढ़ते हैं

पाला हुआ ह्रदय में भ्रम और संशयों को
अब सिर्फ आस्तीनों में नाग ढूँढ़ते हैं

ले नाम रोशनी का करता रहा छलावा
जिसने ये घर जलाया वो चिराग ढूँढ़ते हैं

मुश्किल हुआ है जीना और आबरू बचाना
पग पग पे अपना आँचल और पाग ढूँढ़ते हैं

हैं छंद गीत ग़ज़लों से 'भारद्वाज' रीते
वे गद्य की कड़ी में ही राग ढूँढ़ते  हैं

चंद्रभान भारद्वाज

2 comments:

वन्दना said...

हमेशा की तरह एक बार फिर शानदार गज़ल्…………हर शेर सोचने को मजबूर करता है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत गज़ल