Sunday, August 1, 2010

अपनी निगाह को कभी ओछा नहीं किया

जिसको निभा सके न वह वादा नहीं किया
अपनी निगाह को कभी ओछा नहीं  किया

गुजरे जहाँ से हम वहाँ मौसम बदल गया
हमने कभी हवाओं का पीछा नहीं किया

खुद ही बनाये रास्ते हर लीक तोड़ कर
अपने ज़मीर का कहीं सौदा नहीं किया

चादर हमारी इसलिए उजली रखी हुई
हमने गुनाह पर कोई परदा नहीं किया

सूली चढ़ा कभी कभी दीवार में चुना
सिर प्यार ने कभी मगर नीचा नहीं किया

वह शख्स जान पायेगा क्या  दर्द भूख का
जिसने तमाम उम्र इक फाका नहीं किया

कुछ घाव 'भारद्वाज' बातों के भरे नहीं
हमने दवा के नाम पर क्या क्या नहीं किया

चंद्रभान भारद्वाज

6 comments:

वन्दना said...

आपकी गज़लें तो हमेशा ही एक से बढकर एक होती हैं …………………हर शेर गज़ब के रंगो मे ढला होता है।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

गुजरे जहाँ से हम वहाँ मौसम बदल गया
हमने कभी हवाओं का पीछा नहीं किया
वाह...कमाल का शेर है...

खुद ही बनाये रास्ते हर लीक तोड़ कर
अपने ज़मीर का कहीं सौदा नहीं किया
हौसला देने वाला शेर...

चादर हमारी इसलिए उजली रखी हुई
हमने गुनाह पर कोई परदा नहीं किया
भारद्वाज जी..
हासिले-ग़ज़ल शेर है हमारी नज़र में.
पूरी ग़ज़ल मुकम्मल है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वह शख्स जान पायेगा क्या दर्द भूख का
जिसने तमाम उम्र इक फाका नहीं किया

बहुत खूबसूरत गज़ल

इस्मत ज़ैदी said...

जिसको निभा सके न वह वादा नहीं किया

अपने आप में मुकम्मल है ये मिसरा ही

गुजरे जहाँ से हम वहाँ मौसम बदल गया
हमने कभी हवाओं का पीछा नहीं किया
ख़ुद एतमादी का जज़्बा लिये ख़ूबसूरत शेर

खुद ही बनाये रास्ते हर लीक तोड़ कर
अपने ज़मीर का कहीं सौदा नहीं किया
वाह!ख़ुद्दारी क्या है ये शेर समझा गया
बहुत ख़ूब!

नीरज गोस्वामी said...

भारद्वाज जी मेरा प्रणाम स्वीकारें...निहायत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने...एक एक शेर जोश भर दे रहा है...खुद्दारी का पाठ पढ़ाती हुई नायाब ग़ज़ल...दाद कबूल करें...

नीरज

singhsdm said...

भारद्वाज साहब फिर से एक बार ग़ज़ल के वही तेवर....
मतले से मकते का यह सफ़र बहुत खूबसूरत है....रवानगी तो इस ग़ज़ल की देखते ही बनती है...
जिसको निभा सके न वह वादा नहीं किया
अपनी निगाह को कभी ओछा नहीं किया
क्या बात है.....!
खुद ही बनाये रास्ते हर लीक तोड़ कर
अपने ज़मीर का कहीं सौदा नहीं किया
और
गुजरे जहाँ से हम वहाँ मौसम बदल गया
हमने कभी हवाओं का पीछा नहीं किया
ये ज़ज्बा तो वाकई कमाल का है.... !
चादर हमारी इसलिए उजली रखी हुई
हमने गुनाह पर कोई परदा नहीं किया
काश इस सच्चाई को और लोग भी समझ पाते... ! सीधे अलफ़ाज़ में बहुत बड़ी बात कह डाली हुज़ूर !

वह शख्स जान पायेगा क्या दर्द भूख का
जिसने तमाम उम्र इक फाका नहीं किया
ULTIMATE शेर......!