Wednesday, July 21, 2010

हुनर जानते हैं

समय  के   गुजरते   प्रहर  जानते  हैं 
कि हम ज़िन्दगी  का हुनर जानते हैं

जरूरत नहीं मील के पत्थरों की
हमारे कदम हर डगर जानते हैं

दिशा जानते हैं दशा जानते हैं
हवा बह रही है किधर जानते हैं

खड़ी बीच में एक दीवार ऊँची
उधर की मगर हर खबर जानते हैं 

सदा  फूस  के   ढेर  को  ढूँढती  हैं 
कुटिल चिनगियों की नज़र जानते हैं 

बढ़ी है उमर और हर घूँट पीकर 
दिया है समय ने ज़हर जानते हैं 

पड़े हैं कदम जिस जगह पर हमारे 
मने नित्य उत्सव उधर जानते हैं 

कथा सिलवटों की व्यथा करवटों की 
कहाँ क्या हुआ रात भर जानते हैं 

निभाया बहुत ज़िन्दगी की ग़ज़ल को 
रही कुछ न कुछ पर कसर जानते हैं 

 चंद्रभान भारद्वाज 

5 comments:

arvind said...

जरूरत नहीं मील के पत्थरों की
हमारे कदम हर डगर जानते हैं
...vaah bahut hi khubsurat rachna.

इस्मत ज़ैदी said...

समय के गुजरते प्रहर जानते हैं
कि हम ज़िन्दगी का हुनर जानते हैं

निभाया बहुत ज़िन्दगी की ग़ज़ल को
रही कुछ न कुछ पर कसर जानते हैं

आदरणीय भारद्वाज जी,
ज़िंदगी के उतार चढ़ाव की बहुत सुंदर व्याख्या की है
आप ने ,वैसे तो पूरी ग़ज़ल बहुत अच्छी है लेकिन ये दो अश’आर ख़ास तौर पर अच्छे लगे
आभार

वन्दना said...

वाह्……………बेहद सुन्दर ।

Rajendra Swarnkar said...

परम आदरणीय चंद्रभान भारद्वाज जी
प्रणाम !
आशा है , सपरिवार स्वस्थ - सानन्द होंगे ।

कमाल का कलाम है आपका !

जरूरत नहीं मील के पत्थरों की
हमारे कदम हर डगर जानते हैं

क्या बात है !
निभाया बहुत ज़िन्दगी की ग़ज़ल को
रही कुछ न कुछ पर कसर जानते हैं

वाह ! वाह ! वाह !
आशीर्वाद देने आते रहें शस्वरं पर ।

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

दिशा जानते हैं दशा जानते हैं
हवा बह रही है किधर जानते हैं
वाह....वाह
खड़ी बीच में एक दीवार ऊँची
उधर की मगर हर खबर जानते हैं
कितना खूबसूरत शेर है.