Friday, December 18, 2009

कोई सपना पलक पर बसा ही नहीं

जाने क्या हो गया है पता ही नहीं;


कोई सपना पलक पर बसा ही नहीं।



नापते हैं वो रिश्तों की गहराइयाँ,

जिनकी आंखों में पानी बचा ही नहीं।



उनको मालूम क्या दर्द क्या चीज है,

जिनके पाँवों में काँटा गड़ा ही नहीं।



टूट जाने का अहसास होता कहाँ,

प्यार की डोर में जब बँधा ही नहीं।



गहरी खाई में जाकर गिरेगा कहीं,

राह में मोड़ पर जो मुड़ा ही नहीं।



लोग मीरा कि सुकरात बनने चले ,

स्वाद विष का कभी पर चखा ही नहीं।



बोझ कैसे उठाये भला आदमी,

उसके धड़ पर तो कंधा रहा ही नहीं।



जो पहाड़ों की चोटी चला लाँघने,

खुद की छत पर अभी तक चढ़ा ही नही।



प्यार का अर्थ समझे 'भरद्वाज' क्या,

कृष्ण राधा का दर्शन पढ़ा ही नहीं।



चंद्रभान भारद्वाज

5 comments:

अजय कुमार said...

सरल शब्दों में एक सार्थक रचना

Rajey Sha said...

खूबसूरत भाव रहे हैं आपकी पंक्‍ति‍यों में।

अर्शिया said...

बहुत सुंदर गजल कही है आपने।
बधाई।
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जिसपर हमको है नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।
कोमा में पडी़ बलात्कार पीडिता को चाहिए मृत्यु का अधिकार।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

श्रद्देय भारद्वाज जी
नापते हैं वो रिश्तों की गहराइयाँ,
जिनकी आंखों में पानी बचा ही नहीं।
वाह वाह
बस ऐसा ही कहते रहें, और दाद हासिल करते जायें
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

"अर्श" said...

नापते हैं वो रिश्तों की गहराइयाँ,

जिनकी आंखों में पानी बचा ही नहीं।

बोझ कैसे उठाये भला आदमी,

उसके धड़ पर तो कंधा रहा ही नहीं।

sradhey bhardwaj sahib,
ye dono hi she'r aapki is gazal ke nagine ki tarah hain... khub unchayeeyon pe chad kar gazal jhoom rahi hai ... badhaayeee sahib.


arsh