Monday, October 12, 2009

प्रणय-शतक (प्रेमानुभूति का काव्य)-चंद्रभान भारद्वाज

(१)
मेरे दिल को धडकना सिखाया तूने,
मेरे सपनों को उड़ना सिखाया तूने;
मैं तो अनजान था प्यार के नाम से,
प्यार का पाठ पढ़ना सिखाया तूने।

(२)
आज तू मेरे मन का विषय बन गई,
मेरे चिंतन मनन का विषय बन गई;
प्यार की एक पुस्तक जो मन में लिखी,
तू गहन अध्ययन का विषय बन गई।

(३)
एक मूरत बनाकर सजाया तुझे,
मन के मन्दिर में लाकर बिठाया तुझे;
आरती प्यार की रोज करता हूँ अब,
आँख देखें जिधर सिर्फ़ पाया तुझे।

(४)
प्यार हर एक चाहत को मिलता नहीं,
प्यार हर एक हसरत को मिलता नहीं;
प्यार तुझको मिला देना इज्जत इसे,
प्यार हर एक किस्मत को मिलता नहीं।

(५)
मैं अकेला खड़ा था कहीं राह में,
बन के पत्थर पड़ा था कहीं राह में;
तूने आकर समेटी मेरी ज़िन्दगी,
मैं तो बिखरा पड़ा था कहीं राह में।

(६)

तेरी यादों को मोती बनाता रहूँ,
अपने दिल में उन्हें फ़िर सजाता रहूँ;
तेरी आंखों से आंसू जहाँ भी गिरें,
अपनी पलकों से उनको उठाता रहूँ।

(७)
तेरी आवाज़ अब ज़िन्दगी है मेरी,
तेरा अंदाज़ अब ज़िन्दगी है मेरी;
गर्व तुझ पर बहुत यार करते हैं हम,
तेरा हर नाज़ अब ज़िन्दगी है मेरी।

(८)
गम की दुनिया में तू इक खुशी बन गई,
एक पल में मेरी ज़िन्दगी बन गई;
झाँक कर मेरी आंखों में देखो कभी,
मेरे जीवन की तू रोशनी बन गई।

(9)
फूल बन कर तुझे मैं जगाऊँ सुबह,
ओस बनकर तुझे मैं भिगाऊं सुबह;
मैं हवाओं से खुशबू चुराऊँ सुबह,
गंध बन कर तुझी में समाऊँ सुबह।

(१०)
दर्द सीने में अपने छिपाता रहा,
रात दिन स्वप्न तेरे सजाता रहा;
कोई काँटा चुभे ना तेरे पाँव में,
राह में तेरी दिल को बिछाता रहा।

(११)
रात दिन तुम ख़यालों में आने लगे,
मेरी साँसों में प्राणों में छाने लगे;
मेरे अरमान सोये पड़े थे कहीं,
तेरे सपने उन्हें फ़िर जगाने लगे।

(१२)
जिदगी जबसे मेरी अकेली हुई,
पीर ही सिर्फ़ उसकी सहेली हुई;
तूने आकर न जाने क्या जादू किया,
ज़िन्दगी फ़िर से दुल्हन नवेली हुई।

(१३)
चाँदनी रात भी रात होती अलग ,
प्यार की यार बरसात होती अलग;
राह में साथ होती अगर तू कहीं,
ज़िन्दगी एक सौगात होती अलग।

(१४)
पीर से मेरे प्राणों की शादी हुई,
ज़िन्दगी बस अंधेरों की आदी हुई,
तेरी नज़रों ने जब से छुआ है मुझे,
ज़िन्दगी मेरी फूलों की वादी हुई।

(१५)
तुझको शायद नहीं कोई अंदाज़ है,
तू मेरा प्यार तुझ पर मुझे नाज़ है;
अब तेरे नाम से नाम मेरा जुडा,
मेरी तकदीर तू सर का तू ताज है।

(१६ )
रिश्ते यादों के सब तोड़ आया था मैं,
हर घरोंदा स्वयं फोड़ आया था मैं;
तूने लाकर खड़ा क़र दिया फ़िर वहीँ,
जिस गली को कभी छोड़ आया था मैं।

(१७)
मन के उपवन में तू इक चटकती कली,
मन के आँगन में तू इक चहकती कली;
मेरे जीवन में तू प्राण की डाल पर,
मन की क्यारी में तू इक महकती कली।

(१८)
मेरी आहों में तू मेरी चाहों में तू ,
मेरी मंजिल में तू मेरी राहों में तू;
मेरे तन मन में तू घुल गई इस तरह,
मेरे प्राणों में तू मेरी बाँहों में तू।

(१९)
राह मेरी न जाने कहाँ मुड गई,
दिन का सुख रात की नीद भी उड़ गई;
वक्त लाकर खड़ा कर गया है कहाँ,
तुमसे सहसा मेरी ज़िन्दगी जुड़ गई।

(२०)
मेरी धड़कन मेरी जिंदगानी है तू,
मेरे दिल पर लिखी इक कहानी है तू;
मेरी हर साँस पर राज करती है तू,
मेरे सपनों की अब राजधानी है तू।

(२१)
मेरी सब प्रार्थनाएं हैं तेरे लिए,
मेरी सब भावनाएं हैं तेरे लिए;
मैंने जीवन समर्पित तुझे कर दिया,
मेरी सारी दुआएं हैं तेरे लिए।

(२२)
मेरा घर द्वार तू मेरा संसार तू,
मेरे सपनों की है सिर्फ़ हक़दार तू;
मन के मन्दिर में मेरे तेरी मूर्ति है,
मेरी पूजा है तू है मेरा प्यार तू।

(२३)
मेरे भीगे हुए नैन पहले न थे,
मेरे सिसके हुए बैन पहले न थे;
तुझ से मिलने से पहले अकेला तो था,
प्राण पर ऐसे बेचैन पहले न थे।

(२४)
मेरे हालात तुझ को पता ही नहीं,
मेरे जजबात तुझ को पता ही नहीं;
मैंने तन मन को तेरे हवाले किया,
मेरी यह बात तुझ को पत्ता ही नहीं।

(२५)
तेरे हाथों में मेंहदी लगाता रहूँ ,
तेरे कदमों में कलियाँ बिछाता रहूँ;
बन के खुशबू हवाओं में घुलती रहो,
तेरी साँसों को चंदन बनाता रहूँ।

(२६)
मेरी नज़रों में परियों की रानी है तू,
प्यार की एक सुंदर कहानी है तू;
अपनी लहरों में मुझको बहा ले गई,
चढ़ती नदिया की चंचल रवानी है तू।

(२७)
मुझ को अच्छी तरह से यह अहसास है,
मेरा नादान दिल अब तेरे पास है;
इस ज़माने से मुझ को न लेना है कुछ,
मेरे जीवन में अब सिर्फ़ तू खास है।

(२८)
मेरे हाथों की अनमिट लकीरों में तू,
मेरे प्राणों के अनमोल हीरों में तू;
बाँध कर जिनमें रक्खा हुआ है मुझे,
प्यार की अनदिखी उन जंजीरों में तू।

(२९)

जन्म जन्मों का कोई भी रिश्ता है तू,
मेरी नज़रों में कोई फ़रिश्ता है तू;
कच्चे धागे में बांधा हुआ है जिसे,
प्यार का एक बेनाम रिश्ता है तू।

(३०)
राह मेरी अभी तक थी बहकी हुई,
तुम मिले तो लगी राह महकी हुई;
तेरी नज़रों ने जब से छुआ है मुझे,
ज़िन्दगी फ़िर से लगती है चहकी हुई।

(३१)
जब से बाँहों में चाहत सिमटने लगी,
बीच दोनों की दूरी भी घटने लगी;
पाठ कैसा पढ़ा कर गई तू इसे,
ज़िन्दगी नाम तेरा ही रटने लगी।

(३२)
मैं अंधेरे में तुझ को उजारा बनूँ,
जब थको राह में तो सहारा बनूँ,
तेरे आकाश में जितने भी तारे हैं,
उनमें सबसे चमकता सितारा बनूँ।

(३३)
दर्द में जैसे कोई खुशी मिल गई,
घुप अंधेरे में इक रोशनी मिल गई;
द्वार पर मौत आकर खड़ी थी मेरे,
तू मिली तो नई ज़िन्दगी मिल गई।

(३४)
तेरी यादों का इक सिलसिला मिल गया,
मेरे सपनों को इक घोंसला मिल गया;
बंद धड़कन जगा दी है तूने मेरी,
मैं अकेला था अब काफिला मिल गया।

(३५)
मेरे एकाकी जीवन की है मीत तू,
मेरी सुनसान राहों का संगीत तू;
मैं तो बैठा हुआ हार कर ज़िन्दगी,
मेरे हारे हुए मन की है जीत तू।

(३६)
पहले आना न था पहले जाना न था,
अपना रिश्ता भी कोई पुराना न था;
जब से तू मिल गई तब से लगने लगा,
ज़िन्दगी में तेरे बिन ठिकाना न था।

(३७)
मेरा मकसद है तू मेरी मंजिल है तू,
मेरे जीवन के कण कण में शामिल है तू;
मेरे सीने में हर दम धड़कता है जो,
मेरा नाज़ुक सा मासूम सा दिल है तू।

(३८)
मेरी साँसों में खुशबू महकती तेरी,
मेरे कानों में आहट खनकती तेरी;
मैं रखूँ खोल कर या रखूँ बंद मै,
मेरी आंखों में सूरत चमकती तेरी।

(३९)
मेरे सपनों में छाई है तेरी हँसी,
मेरे दिल में समाई है तेरी हँसी;
मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे,
याद जब जब भी आई है तेरी हँसी।

(४०)
पहले मेरा कहीं भी ठिकाना न था,
कोई बैठक कोई आशियाना न था;
जब से तू मिल गई ज़िन्दगी मिल गई,
वरना जीने का कोई बहाना न था।

2 comments:

नीरज गोस्वामी said...

जिदगी जबसे मेरी अकेली हुई,
पीर ही सिर्फ़ उसकी सहेली हुई;
तूने आकर न जाने क्या जादू किया,
ज़िन्दगी फ़िर से दुल्हन नवेली हुई।


वाह वा...एक से बढ़ कर एक अद्भुत रचनाएँ...नमन है आपकी लेखनी को....
नीरज

वन्दना said...

kya kahun..........aapki lekhni ne to zindagi ka har rang bhar diya hai.........sach jeevan ke har utar chadhav ke motiyon ki sundar mala banayi hai..........bahut bahut hardik badhayi sweekarein.