Monday, August 3, 2009

करवटों में कटी

प्यार की इक उमर करवटों में कटी;
चाहतों में कटी आहटों में कटी।

हो प्रतीक्षा की या हो विरह की घड़ी,
खिड़कियों में कटी चौखटों में कटी।

जिनके प्रियतम बसे दूर परदेश में,
उनकी विरहन उमर घूंघटों में कटी।

प्यार के तेल बिन जो जले ही नहीं,
उन दियों की उमर दीवटों में कटी।

प्यार के इक कुए से दिलासा लिए,
गागरों की उमर पनघटों में कटी।

प्यार के तंत्र में साधना रत उमर,
पागलों की तरह मरघटों में कटी।

प्यार में डूब कर जो न उबरे कभी,
वय 'भरद्वाज' उनकी लटों में कटी।

चंद्रभान भारद्वाज

4 comments:

M VERMA said...

प्यार में डूब कर जो न उबरे कभी,
वय 'भरद्वाज' उनकी लटों में कटी।
भारद्वाज जी
बेहतरीन रचना
सुन्दर एहसास

"अर्श" said...

आदरणीय भरद्वाज जी नमस्कार,
आपकी गज़लें वाकई इतनी उम्दा होती है के कुछ कहते नहीं बनता ... और यही बात इस ग़ज़ल के बारे में भी है ....

हो प्रतीक्षा की या हो विरह की घड़ी,
खिड़कियों में कटी चौखटों में कटी।

अब इस शे'र के बारे में जीतनी प्रशंसा की जाये कम है दिल वाह वाह करते नहीं थकता... बहोत बहोत बधाई


अर्श

ओम आर्य said...

ek behad khubsoorat rachana
jaha sirf pyar hi pyar hai
jisame bhawanaye besumar hai
atisundar...........

गौतम राजऋषि said...

अहा...अद्‍भुत काफ़ियों से सजी एक बेमिसाल ग़ज़ल जनाब....
और मतला तो हाय रे!!!