Friday, February 8, 2019



    


          रास्ते अपने अलग हैं 

रास्ते अपने अलग हैं इस जमाने के अलग

पार जाने के अलग हैं डूब जाने के अलग



अपनी अपनी ढपलियाँ हैं अपनी अपनी रागिनी 

व्याख्याएं तो अलग हैं शब्द गाने के अलग 


साज़ सबके और साजिंदे भी सब के एक से 

राग के आलाप लेकिन हर घराने के अलग 




हैं अलग खुद के लिए तो सत्यनिष्ठा के नियम 

पर नियम औरों की निष्ठा आजमाने के अलग




मेल खाता ही नहीं है व्यक्ति से व्यक्तित्व का   

दाँत खाने के अलग हैं पर दिखाने के अलग 




खेत में गाड़े हुए हैं जो बिजूके बाँस के 

भय दिखाने के अलग हैं खग उड़ाने के अलग 




देह के स्पर्श सब पहचानती हैं लड़कियाँ 

छेड़खानी के अलग हैं गुदगुदाने के अलग 




लोभ में दानों के चिड़ियाँ फँस गईं  हैं जाल में 

गूँजते स्वर उनके डर से चहचहाने के अलग 





प्यार भारद्वाज मसला है नहीं कानून का 

दिल बने हैं प्यार का रिश्ता निभाने के अलग 




 चंद्रभान भारद्वाज 



Friday, January 11, 2019

                 सुगम रस्ता नहीं मिलता 

कभी मतला नहीं मिलता कभी मकता नहीं मिलता
ग़ज़लगोई में कोई भी सुगम रस्ता नहीं मिलता 

खपाता जो उमर अपनी ग़ज़ल कहने में सुनने में
उसे इक मान का तमगा कि गुलदस्ता नहीं मिलता 

कभी मरने पे उसकी शायरी की क़द्र होती है
जिसे जीवन में महफ़िल या कोई श्रोता नहीं मिलता  

जहाँ परिवार में मिलती है शिक्षा संस्कारों की
किसी बच्चे के कंधे पर कोई बस्ता नहीं मिलता 

मिलेगी गाँव में मक्के की रोटी साग सरसों का
वहाँ पीज़ा नहीं बर्गर नहीं पाश्ता नहीं मिलता 

यहाँ खुद आदमी का खून तो मिलता है सस्ते में
मगर सामान उसकी भूख का सस्ता नहीं मिलता 

सदा उत्पात कर देता खड़ा शैतान बस्ती में
अगर बाजार से उसको नियत हफ्ता नहीं मिलता 

ठहाके मारकर हैवान तो फिरता है सडकों पर
किसी इंसान का चेहरा मगर हँसता नहीं मिलता 

किसी को तो नज़र मिलते ही 'भारद्वाज 'मिल जाता
किसी को ज़िंदगी भर प्यार का रिश्ता नहीं मिलता 

चंद्रभान भारद्वाज







Thursday, October 18, 2018

जगमग जो शहर लगता है

रात में बिजली से जगमग जो शहर लगता है
उस के चेहरों पे तनावों का असर लगता है

लोग सहमे हुए लगते हैं जहाँ पग पग पर
सीना ताने हुए  शैतान निडर लगता है

वक्त ने ऐसा अविश्वास किया है पैदा
आप को खुद की भी परछाँई से डर लगता है

साँस लेना भी सुबह शाम हुआ है मुश्किल
बस धुआँ धूल का हर ओर कहर लगता है

लूट दुष्कर्म कि हत्याओं की घटनाओं से
रोज अखबार का हर पृष्ठ ही तर लगता है

वक़्त के संग यहाँ लोग बदलते रंगत
जो सुबह लगता इधर शाम उधर लगता है 

शख्स जो रोज नया पहने मुखौटा फिरता
वो जिधर से भी गुजर जाए खबर लगता है 

पथ्य बीमार को देते हैं समझ कर अमृत
वो पहुँचते ही शिराओं में जहर लगता है

बाद मुद्दत के भरद्वाज चढ़ा जब चौखट
द्वार अपना सा लगा अपना सा घर  लगता है

चंद्रभान भारद्वाज


Tuesday, September 25, 2018


             उस राह से गुजरना 

जिस पर चला न कोई उस राह से गुजरना 

आदर के साथ जीना साहस के साथ मरना 


ऊँचाइयों पे चढ़ना आसान ज़िंदगी में 

लेकिन बहुत कठिन है गहराई में उतरना 


क्या आसमान देंगे तेरी उड़ान को वे 

जिनका है काम उड़ते पंछी के पर कतरना 


वे लोग क्या करेंगे तुरपन फटे हुए की 

जिनकी रही है आदत दामन सदा कुतरना 


मतलब नहीं विजय का हर दाँव जीत जाना 

है अर्थ हर विजय का गिर गिर के फिर सँवरना 


जो बाँध कर गले में पत्थर स्वयं ही डूबा 

मुश्किल है उसका बच कर फिर से कहीं उबरना 


जो 'भारद्वाज' लिक्खा है प्यार के रँगों से 

निश्चित कहीं क्षितिज पर उस नाम का उभरना 


चंद्रभान भारद्वाज 







Sunday, September 9, 2018

              प्रेम की कहानी 


इतनी सी बस रही है इक प्रेम की कहानी 

मटके से पार करते उफनी नदी का पानी 


आती है बन के बाधा हर प्रेम की डगर में 

खोई हुई अँगूठी भूली हुई निशानी 


इस प्रेम-यज्ञ में जो प्राणों को होम करती 

होती है या दिवानी या होती है शिवानी 


यह प्रेम सत्य भी है शिव भी है सुंदरम भी 

इस भाव का नहीं है जीवन में कोई सानी 


आता है प्यार का जब मौसम बहार बनकर 

होती हैं अंकुरित खुद सूखी जड़ें पुरानी 


इक डोर में बँधे पर रहते अलग अलग हैं 

आपस का हाल पूछें बस और की जबानी 


हैं 'भरद्वाज़' इसमें अक्षर तो बस अढ़ाई 

पर प्रेम को न समझे विद्वान् और ज्ञानी 


चंद्रभान भारद्वाज 

Saturday, September 1, 2018

  तारों से पूछना 


रातों की सब कहानियाँ तारों से पूछना
पीड़ाएँ इंतजार की द्वारों से पूछना 


तप तप के प्रेम-अग्नि में क्यों राख हो गए
तपने का अर्थ प्रेम के मारों से पूछना 


सहती रही है मार इक इक तंतु के लिए
धुनती रुई का दर्द पिंजियारों से पूछना 


दाना नहीं मिला कभी पानी नहीं मिला
यायावरी का हाल बनजारों से पूछना 


जब नींव की हर ईंट को खुद तोड़ते रहे
गिरने का क्यों सवाल दीवारों से पूछना 


हर राग रागहीन है लयहीन रागिनी
सुरहीन क्यों अलाप फनकारों से पूछना  


घर में डरे हुए डगर में भी डरे हुए
डर का सुराग आग तलवारों से पूछना  


अब देश प्रांत गाँव घर सारे बँटे हुए
बंटने का राज भाषणों नारों से पूछना 


हम 'भारद्वाज' कल थे जो हैं आज भी वही
बदली नज़र उन्होंने क्यों यारों से पूछना 


चंद्रभान भारद्वाज
   


Friday, August 24, 2018



           मंजिल तलाशना



राहें तलाशना नई मंजिल तलाशना

दुख दर्द संग बाँट ले वह दिल तलाशना


इंसान शून्य कर दिया है आज वक्त ने 

फिर दशगुना बने कोई हासिल तलाशना


चेहरे को सिर्फ देख कर संभव नहीं रहा 

आदिल तलाशना कोई काबिल तलाशना 


हर डाल पर जमी  है कौओं की बिरादरी

है काँव काँव में कठिन कोकिल तलाशना


कोई  सबूत ही नहीं छोड़ा है खून का

मुश्किल हुआ कटार या कातिल तलाशना



अब तक तो  हर खुशी पे ही जैसे ग्रहण लगा

जीवन के शेष पल सभी झिलमिल तलाशना


जब भी अचानक ठंड के मौसम का हो असर 

सेहत सुधारने को गुड़ और तिल तलाशना 


तूफान ने बड़े किये हम पाल पोस कर

आदत हमारी है नहीं साहिल तलाशना


ग़ज़लों की सिर्फ बात भारद्वाज हो जहाँ

कोई  किताब या कोई महफिल तलाशना


चंद्रभान भारद्वाज