Tuesday, August 13, 2019
Friday, July 26, 2019
हँसकर गुजर जाती
कभी रोकर गुजर जाती कभी हँसकर गुजर जाती
किसी के नाम से यदि ज़िंदगी जुड़कर गुजर जाती
किसी के नाम से यदि ज़िंदगी जुड़कर गुजर जाती
नहीं स्वीकार करते यदि प्रणय प्रस्ताव वे अपना
उमर उनकी गली के काटकर चक्कर गुजर जाती
निगाहें खुद उठाकर सिर्फ हमको देख लेते वे
हमारी उम्र उनका नाम जप जप कर गुजर जाती
इधर दुःख का कुआँ मिलता अभावों की उधर खाई
उमर उनमें बराबर संतुलन रखकर गुजर जाती
सुगम राहें नहीं मिलतीं सहज मंज़िल नहीं मिलती
उमर कँकरीली सब पगडंडियाँ चलकर गुजर जाती
नदी इक आग की पड़ती है प्रिय की राह में अक्सर
धधकती आग को यह ज़िंदगी पीकर गुजर जाती
अगर कठिनाइयों के ढीठ पर्बत रोकते राहें
मचलती ज़िंदगी हर इक शिखर चढ़कर गुजर जाती
सफर में सिर्फ चलती ज़िंदगी का नाम है गाड़ी
कहीं सरपट गुजर जाती कहीं रुककर गुजर जाती
अँधेरों ने जिसे खुद आज 'भारद्वाज ' घेरा है
वही क्षितिजों पे अपना नाम चमकाकर गुजर जाती
चंद्रभान भारद्वाज
Friday, July 5, 2019
तपाओ तो सही
ज़िंदगी को वक़्त की लौ पर तपाओ तो सही
आँच में रख प्राण को कुंदन बनाओ तो सही
एक दिन आकाश खुद आएगा धरती पर उतर
हौसलों को ऊँचे से ऊँचा उड़ाओ तो सही
हर्ष के अंकुर उगेंगे देह के हर रोम से
अपनी मिट्टी में लहू अपना मिलाओ तो सही
साफ़ दिख जाएगा इस दुनिया का चेहरा आपको
धूल अपने मन के दर्पण से हटाओ तो सही
दूर होगा एक क्षण में घुप अँधेरा राह का
आस का छोटा सा इक दीया जलाओ तो सही
रंग चटकीले लगेंगे प्रेम के विश्वास के
आँख से नफरत के सब परदे उठाओ तो सही
हर तरफ दिखने लगेगा सिर्फ 'भारद्वाज ' प्रिय
प्रेम सागर में तनिक डुबकी लगाओ तो सही
चंद्रभान भारद्वाज
Tuesday, June 25, 2019
साँचों में ढलना आ गया है
जिसे साँचों में ढलना आ गया है
समय के संग चलना आ गया है
फँसेगा चक्रव्यूहों में नहीं अब
उसे बाहर निकलना आ गया है
चमकता ही रहेगा हर दिशा में
सतत दीपक सा जलना आ गया है
कहीं गाड़ी नहीं उसकी रुकेगी
सही पटरी बदलना आ गया है
जरुरत अब नहीं बैसाखियों की
कुलाँचें भर उछलना आ गया है
नए अंकुर उगें नस नस में उसकी
जिसे मिटटी में मिलना आ गया है
न उसकी नाव डूबेगी भँवर में
थपेड़ों में सँभलना आ गया है
गुलाबों में उसी की होती गिनती
जिसे काँटों में खिलना आ गया है
न 'भारद्वाज ' की हस्ती मिटेगी
उसे ग़ज़लों में ढलना आ गया है
चंद्रभान भारद्वाज
Monday, June 3, 2019
हवन करते करते
बुराई का पुतला दहन करते करते
जली हैं उँगलियाँ हवन करते करते
मिली हैं जमाने की आलोचनाएँ
भलाई का कोई यतन करते करते
न माया मिली है नहीं राम पाए
भटकता रहा मन भजन करते करते
पराजित नहीं सत्य को कर सकी हैं
चुकीं शक्तियाँ सब दमन करते करते
न राहें मिली हैं न मंजिल ही पाई
उमर थक गई है गमन करते करते
कमर तो झुकी हो गई टेढ़ी गर्दन
मठों मंदिरों में नमन करते करते
'भरद्वाज' लौकिक, हुआ पारलौकिक
गहन प्रेम का अध्ययन करते करते
चंद्रभान भारद्वाज
Saturday, May 25, 2019
हल करते करते
उलझती गई और हल करते करते
ये जीवन की गुत्थी सरल करते करते
लगा श्वेत आँचल पे धब्बा जो काला
गया फ़ैल ज्यादा धवल करते करते
सँजोये थे जीवन में सपने सलोने
अधूरे रहे हैं वो कल करते करते
अगर ठान रक्खी है हठधर्मिता तो
बढ़ेगी शमन की पहल करते करते
स्वयं की कला की चमक खो चुके हैं
विदेशी की भोंड़ी नक़ल करते करते
गई दृष्टि कल ज्योति भी अब गँवाई
विरह में ये आँखें सजल करते करते
फँसा आदमी चक्रव्यूहों में अक्सर
'भरदवाज' सच पर अमल करते करते
चंद्रभान भारद्वाज
Sunday, April 7, 2019
दूसरों की बात लिख
आप-बीती छोड़ कर कुछ दूसरों की बात लिख
सो रहे फुटपाथ पर उन बेघरों की बात लिख
अब तलक लिखते रहे हो राजमहलों की कथा
निर्धनों की झोंपडी की छप्परों की बात लिख
घोषणा ही घोषणाएं हो रहीं हर मंच से
मिल नहीं पाए कभी उन अवसरों की बात लिख
डाल कर दाने फँसाया पंछियों को जाल में
अब कतर डाले सभी के उन परों की बात लिख
छोड़ कर जनहित लगे हैं बस स्वहित को साधने
धर्म की उन मस्जिदों की मंदिरों की बात लिख
जो गहन गंभीर मुद्दों को भी हलके ले रहे
आज के उन मसखरों उन जोकरों की बात लिख
उच्च शिखरों पर जड़े उन पर लिखा तो क्या लिखा
नींव के नीचे गड़े उन पत्थरों की बात लिख
बाँध कर मुट्ठी बनाते जो कबूतर धूल से
उन जमूरों और उन जादूगरों की बात लिख
अब तलक लिखते रहे हो बस अँधेरे पक्ष को
आज 'भरद्वाज़ उजले अक्षरों की बात लिख
चंद्रभान भारद्वाज
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