Sunday, August 18, 2019

प्रणय-शतक

प्रणय-शतक

()
मेरे दिल को धडकना सिखाती रही ,
मेरे सपनों को उड़ना सिखाती रही ;
मैं तो अनजान था प्यार से वो मगर ,
प्यार का पाठ पढ़ना सिखाती रही 

()
आज वह मेरे मन का विषय बन गई,
मेरे चिंतन मनन का विषय बन गई;
प्यार की एक पुस्तक सी मन में लिखी,
वह गहन अध्ययन का विषय बन गई।

()
एक मूरत बनाकर सजाया उसे ,
मन के मन्दिर में लाकर बिठाया उसे ;
आरती प्यार की रोज करता हूँ अब,
आँख देखें जिधर सिर्फ़ पाया उसे 

 ()
प्यार हर एक चाहत को मिलता नहीं,
प्यार हर एक हसरत को मिलता नहीं;
प्यार को उसने मुझ पर लुटाया सदा ,
प्यार हर एक किस्मत को मिलता नही 

 ()
मैं अकेला खड़ा था कहीं राह में
बन के पत्थर पड़ा था कहीं राह में
उसने आकर समेटी मेरी ज़िंदगी 
मैं तो बिखरा पड़ा था कहीं राह में

()
उसकी यादों को मोती बनाता रहा ,
अपने दिल में उन्हें फ़िर सजाता रहा ;
उसकी आंखों से आँसू जहाँ भी गिरे,
अपनी पलकों से उनको उठाता रहा।

()
उसकी आवाज थी जिंदगी कल मेरी,
बाँका अंदाज थी जिंदगी कल मेरी;
गर्व उस पर बहुत यार करते हैं हम,
उससे सरताज थी जिंदगी कल मेरी।

(
)
गम की दुनिया में वह इक खुशी बन गई,
एक पल में मेरी ज़िन्दगी बन गई;
झाँकती  मेरी आंखों में उसकी ही छवि ,
मेरे जीवन की वह रोशनी बन गई।

(9)

फूल बन कर सुबह गुदगुदाती थी वह,
ओस बनकर सुबह नित भिगाती थी वह;
खुद हवाओं से खुशबू चुराकर सुबह,
गंध बन कर मुझी में समाती थी वह.

(१०)
दर्द सीने में अपने छिपाता रहा,
रात दिन स्वप्न उसके सजाता रहा;
कोई काँटा  पाँवों में उसके चुभे ,
उसकी राहों में दिल को बिछाता रहा।

(
११)
रात दिन वह ख़यालों में आती रही ,
मेरी साँसों में प्राणों में छाती रही ;
मेरे अरमान सोये पड़े थे कहीं,
बन के सपने उन्हें फिर जगाती रही।


(
१२)
जिदगी जबसे मेरी अकेली हुई,
पीर ही सिर्फ़ उसकी सहेली हुई;
उसके जाने से दुनिया ही उजड़ी मेरी,
ज़िन्दगी फिर  दुल्हन नवेली हुई।


 (१३)
चाँदनी रात भी अब अँधेरी लगे,
ज़िंदगी राख की एक ढेरी लगे ;
राह में साथ छोड़ा था उसने जहाँ ,
बस वहाँ से ही दुनिया लुटेरी लगे।

(
१४)
पीर से मेरे प्राणों की शादी हुई,
ज़िन्दगी बस अंधेरों की आदी हुई,
उसकी नज़रों ने जब से हुआ दूर हूँ ,
ज़िन्दगी मेरी काँटों की वादी हुई।

(
१५)
उसको शायद नहीं कोई अंदाज था ,
वह मेरा प्यार जिस पर मुझे नाज था ;
 
नाम से उसके जब नाम मेरा जुडा,
मेरी तकदीर का सर का वह ताज था।

(१६ )
रिश्ते यादों के सब तोड़ आया हूँ अब,
हर घरोंदा स्वयं फोड़ आया हूँ अब 
ज़िंदगी में जहाँ भेँट उससे हुई;
वह गली और घर छोड़ आया हूँ अब


(१७)
मन के उपवन में थी वह महकती कली,
मन के आँगन में थी वह चहकती कली;
मेरे जीवन में वह प्राण की डाल पर,
थी महकती चहकती लचकती कली

 (१८)
मेरी बाँहों में वह मेरी चाहों में वह,
मेरी मंजिल में वह मेरी राहों में वह;
मेरे तन मन में वह मेरी नस नस में वह,
मेरे प्राणों में वह मेरी आहों में वह 

(१९)
राह मेरी  जाने कहाँ मुड गई,
दिन का सुख रात की नीद भी उड़ गई;
वक्त लाकर खड़ा कर गया है कहाँ,
पीर से सहसा अब ज़िन्दगी जुड़ गई।

(२०)
मेरी धड़कन मेरी जिंदगानी थी वह,
मेरे दिल पर लिखी इक कहानी थी वह;
मेरी हर साँस पर राज करती थी वह,
मेरे सपनों की इक राजधानी थी वह 

(२१)
मेरी सब प्रार्थनाएं थीं उसके लिए,
मेरी सब भावनाएं थीं उसके लिए;
मैंने जीवन समर्पित उसे कर दिया,
मेरी सब कामनाएं थीं उसके लिए।

(२२)
मेरा घर द्वार थी मेरा संसार थी,
मेरे हर एक सपने की हक़दार थी;
मन के मन्दिर में हर मूर्ति उसकी बनी,
मेरी पूजा थी वहवह मेरा प्यार थी 

(२३)
मेरे भीगे हुए नैन पहले  थे,
मेरे सिसके हुए बैन पहले  थे;
हर तरफ आज बेचैनियों से घिरा,
प्राण सच ऐसे बेचैन पहले  थे।

(२४)
मेरे हालात उस से छिपे तो  थे,
मेरे जजबात उस से छिपे तो  थे;
कैसे तन मन संभालूँगा उसके बिना,
यह सवालात उस से छिपे तो  थे 


(२५)
उसके हाथों में मेंहदी लगाता रहा,
उसके कदमों में कलियाँ बिछाता रहा;
बन के खुशबू हवाओं में घुलता रहा,
उसकी साँसों को चंदन बनाता रहा 

(२६)
मेरी नज़रों में परियों की रानी थी वह,
प्यार की एक सुंदर कहानी थी वह;
अपनी लहरों में मुझको बहा ले गई,
चढ़ती सरिता की चंचल रवानी थी वह 

(२७)
मुझ को अच्छी तरह पूरा अहसास था,
वह थी मेरी ख़ुशी मेरा उल्लास था;
इस ज़माने से मुझ को  लेना था कुछ,
संग उसका ही मेरे लिए खास था 

(२८)
मेरे हाथों की अनमिट लकीरों में वह,
मेरे प्राणों के अनगिन जखीरों में वह;
बाँध कर जिनमें रक्खा हुआ है मुझे,
प्यार की अनदिखी उन जँजीरों में वह 

(२९)
जन्म जन्मों का ज्यों एक रिश्ता थी वह,
मेरी नज़रों में कोई फ़रिश्ता थी वह;
कच्चे धागे में बांधा हुआ था मगर,
प्यार का पक्का गठ जोड़ रिश्ता थी वह 

(३०)
ज़िंदगी मेरी पहले थी बहकी हुई,
वह मिली तो लगी राह चहकी हुई;
उसकी नज़रों ने जब से छुआ था मुझे,
मेरी हर साँस लगती थी महकी हुई।

(३१)
मेरी बाँहों में दुनिया सिमटने लगी,
बीच दोनों के जब दूरी घटने लगी;
पाठ कैसा पढ़ा कर गई वह मुझे,
ज़िन्दगी नाम उसका ही रटने लगी।

(३२)
वह अंधेरे में मेरा उजारा बनी,
जब थका राह में तो सहारा बनी,
पाँव जब भी भटकने लगे राह में,
दे दिशा ज्ञान नभ का सितारा बनी।

(३३)
दुःख के वातावरण में खुशी मिल गई,
अंधी आँखों को ज्यों रोशनी मिल गई;
द्वार पर मौत आकर खड़ी थी मेरे,
वह मिली तो नई ज़िन्दगी मिल गई।

(३४)
उसकी यादों का इक सिलसिला मिल गया,
मेरे सपनों को इक काफिला मिल गया;
बंद धड़कन जगा दी है उसने मेरी,
प्यार का ऐसा अद्भुत सिला मिल गया।

(३५)
मेरे एकाकी जीवन की थी मीत वह ,
मेरी सुनसान राहों का थी गीत वह;
जब भी बैठा कभी हार कर ज़िंदगी,
मेरे हारे हुए मन की थी जीत वह 

(३६)
अपना मालूम अच्छी तरह कद मुझे,
अपनी मालूम अच्छी तरह हद मुझे;
उसकी यादें ही कमजोर करती मुझे,
उसकी यादें ही करती हैं गदगद मुझे 

(३७)
मेरा मकसद थी वह मेरी मंजिल थी वह,
मेरे जीवन के कन कन में शामिल थी वह;
मेरे सीने में हर दम धड़कता है जो,
मेरा नाज़ुक सा मासूम सा दिल थी वह 

(३८)
बन के साँसों में खुशबू महकती रही,
बन के कानों में सरगम सी बजती रही;
मैं रखूँ खोल कर या रखूँ बंद मै,
आँख में उसकी सूरत चमकती रही।

(३९)
मेरे सपनों में छाई है उसकी हँसी,
मेरे दिल में समाई है उसकी हँसी;
मेरी आँखों के आँसू भी थमते नहीं,
याद जब जब भी आई है उसकी हँसी।

(४०)
पहले मेरा कहीं भी ठिकाना  था,
कोई सपनों का इक आशियाना  था;
वह मिली तो लगा ज़िंदगी मिल गई,
वरना जीने का कोई बहाना  था।


(४१)
मेरे सपनों के संसार में वह रही,
मेरी यादों के आगार में वह रही;
मैंने मन की तहों में सहेजा सदा,
ज़िन्दगी भर मेरे प्यार में वह रही 

 (४२)
मुझ को दुनिया के आचार जमते नहीं,
भाव मन के कहीं और रमते नहीं;
उसकी यादों में जब भी विचरता है मन,
मेरे आँसू भी आंखों में थमते नहीं।

(४३)
जागता मैं रहा या कि सोता रहा
उसकी यादों में हर वक्त खोता रहा;
एक हलचल सदा मन को मथती रही,
बस अकेले-अकेले ही रोता रहा।

(४४)
प्यार की जब ग़ज़ल कोई पढ़ता हूँ मैं,
मन में मूरत सदा उसकी गढ़ता हूँ मैं;
उसकी तस्वीर मन में सुरक्षित रहे,
भावनाओं के शीशे में मढ़ता हूं मैं।

(४५)
उसका अहसास दिल से निकलता नहीं,
लाख समझाया पर दिल बहलता नहीं;
हार कर दिल से बैठा हुआ आज मैं,
मेरा दिल मुझ से बिल्कुल सँभलता नहीं।

(४६)
अपनी बेचैनियाँ मैं बताऊँ किसे,
दिल में तूफ़ान उठता दिखाऊँ किसे;
छोड़ कर मुझ को मझधार में वह गई,
यह अधूरी कहानी सुनाऊँ किसे।

(४७)
छोड़ आया हूँ संसार का रास्ता,
भूल बैठा हूँ मैं प्यार का रास्ता;
ऐसा लगता है मुझको बुलाती है वह ,
ढूँढता उसके घर-द्वार का रास्ता।

(४८)
उसकी खुशबू घुली मेरी साँसों में है,
उसका सपना बसा मेरी आँखों में है
वो जो बन कर रही थी मेरी ज़िन्दगी,
उसकी सूरत रमी मेरे प्राणों में है 

(४९)
उसकी छवि के सिवा कुछ दिखाई  दे,
उसके  स्वर के सिवा कुछ सुनाई  दे;
उसके दामन से लगता हूँ लिपटा हुआ ,
मुझ को उस के सिवा कुछ सुझाई  दे।

(५०)
हर सुबह याद उसकी जगाती मुझे,
रात को याद उसकी सुलाती मुझे;
मुझको बेचैनियों ने रखा घेर कर,
हर समय याद उसकी सताती मुझे।

(५१)
मेरे  प्राणों की वो ही हवा थी कभी ,
ज़िंदगी अब अधूरी सवा थी कभी ;
सालते जो रहे ज़िन्दगी भर मुझे,
रिसते घावों की वह ही दवा थी कभी। 

(५२)
उसका चेहरा नज़र में समाया हुआ,
मेरा मन उसके रँग में नहाया हुआ;
भूल पाता नहीं एक पल भी उसे,
उसका ऐसा नशा मुझ पे छाया हुआ।


(५३)
देखता है सुबह को  अब शाम को,
रटता रहता है मन उसके बस नाम को;
हद से बढ़ने लगी इसकी दीवानगी,
झेलूँ कब तक बता इसके परिणाम को।

(५४)
बहके कदमों को मेरे सहारा थी वह,
डूबती नाव को इक किनारा थी वह 
मेरे जीवन को उसने दिशा दी सदा,
मन के मरुथल में कल कल सी धारा थी वह 

(५५)
मेरे मन में बसीं उसकी परछाइयाँ,
मेरी साँसों में बजती थीं शहनाइयाँ;
मेरी सूनी निगाहों में फैली हैं अब,
उसके बिन  हर तरफ़ सिर्फ़ तन्हाइयां।  

(५६)
उसकी यादों से दिन की शुरूआत है,
उसके सपनों में गुज़रे हरिक रात है;
मेरा तन मन रमा उसके ही ध्यान में,
मेरे प्राणों को वह एक सौगात है 

(५७)
घूमता है कभी पागलों की तरह,
झूमता है कभी बादलों की तरह;
उसकी यादों में बेचैन है इतना दिल
आह भरता है बस घायलों की तरह।

(५८)
मेरे मन को सदा गुदगुदाती थी वह,
मेरे मन पर लिखी प्रेम पाती थी वह;
उसने जीवन मेरा रोशनी से भरा,
प्रेम दीपक की इक जलती बाती थी वह 

(५९)
एक मूरत गढ़ी उसकी अब नेह की,
उसमें खुशबू भरी उसकी अब देह की;
उसकी यादें भिगोती हैं कुछ इस तरह,
जैसे बूँदें भिगोतीं हमें मेह की।

(६०)
मेरा सपना थी वह मेरी चाहत थी वह,
मेरी कमजोरी थी मेरी ताकत थी वह;
उस को पाकर बहुत गर्व करता था मैं,
मेरा ईमान थी मेरी इज्जत थी वह 

(६१)
मेरी नज़रों में वह एक कोमल कली,
धूप में ही खिली धूप में ही पली;
छाँह बन कर सदा साथ में वह रही ,
उससे महकी सदा मेरे मन की गली।

(६२)
उसकी तसवीर में रंग भरता रहा,
उसकी आँखों में गहरे उतरता रहा;
उसको मालूम था या नहीं क्या पता,
चुपके चुपके उसे प्यार करता रहा।

(६३)
खुशबू बन मेरे तन पर बिखरती रही,
बन के सपना पलक पर उतरती रही;
रात दिन उसकी चाहत रही थी यही,
मेरे आँचल को खुशियों से भरती रही 

(६४)
उसकी खशबू यहाँ उसकी खुशबू वहाँ,
पर दिखाई  देती छुपी है जहाँ;
कोई इतना पता तो बता दे मुझे
अपनी आँखों से उसको निहारूं कहाँ 

(६५)
सूर्य की हर किरण रोशनी दे उसे,
हर सुबह इक नई ज़िन्दगी दे उसे;
उसके  दामन में खुशियाँ समांयें नहीं,
मेरा सतसांई इतनी खुशी दे उसे 

(६६)
मैं  समझा कि संसार क्या चीज है,
इसके इस पार उस  पार क्या चीज है;
वह  मिली तब से ही मैं समझने लगा ,
ज़िंदगी के लिए प्यार क्या चीज है। 


(६७)
दर्द रह रह के उठता है दिल में मेरे,
इक धुंआ सा घुमड़ता है दिल में मेरे;
साँस रूकती मेरी दम निकलता मेरा
ख्याल उसका उमड़ता है दिल में मेरे।

(६८)
मेरी हर आस थी मेरा उल्लास थी,
वह  मेरी आस्था मेरा विश्वास थी ;
सारे  डूबे सितारे चमकने लगे,
जब से जीवन में आई अनायास थी 

(६९)
कोई रिश्ता कभी जोड़ पाना कठिन 
कोई रिश्ता कभी तोड़ पाना कठिन 
मन का मन से हुआ ऐसा गठजोड़ था 
पीछे कदमों को था मोड़  पाना कठिन 

(७०)
जब से मन में मेरे उसकी चाहत जगी,
हद से बढ़ने लगी मेरी दीवानगी;
मुझ को उसके सिवा कुछ दिखाई  दे,
उसकी यादें बनीं हैं  मेरी जिंदगी। 

(७१)
मेरे मन के उजालों में रहती है वह,
मेरे मन के शिवालों में रहती है वह;
हाल अपने हृदय का बताऊँ किसे,
मेरे हरदम खयालों में रहती है वह 

(७२)
डाल से टूटे पत्ते सा उड़ना पडा,
मुझ को मिलने से पहले बिछुड़ना पड़ा;
प्यार में वह सजा दी गई है मुझे,
मुझ को दहके अँगारों से जुड़ना पड़ा।


(७३)
मेरी आँखों को सपना दिखा कर गई,
मेरी साँसों को चलना सिखाकर गई;
मैं तो बैठा था चुपचाप थक हार कर,
प्यार की पर सुधा वह पिला कर गई 

(७४)
मेरी शोहरत थी वह मेरी इज्जत थी वह,
मेरे जीवन की हर इक जरूरत थी वह ;
मेरे हाथों की अनमिट लकीरों में थी
विधि ने जो खुद लिखी मेरी किस्मत थी वह 

(७५)
यों कटेंगे सुबह शाम सोचा  था,
ज़िंदगी होगी गुमनाम सोचा  था;
दिल की बेचैनियाँ हद से बढ़ने लगीं,
प्यार का ऐसा अंजाम सोचा  था।

(७६)
दीप का रोशनी से जो रिश्ता रहा,
चाँद का चाँदनी से जो रिश्ता रहा;
उसका रिश्ता रहा मुझ से ऐसा सदा,
प्राण का ज़िंदगी से जो रिश्ता रहा।


(७७)
वह मिली तो डगर में उजाले हुए,
मेरे जीवन के रँग ढँग निराले हुए;
देख कर उस को साकार होने लगे,
मैंने आँखों में सपने जो पाले हुए।

(७८)
मेरे होठों पे वह एक मुस्कान थी,
मेरी आँखों में सपनों का प्रतिमान थी;
मेरे प्राणों में हर वक्त बजती हुई,
कोई संगीत की वह मधुर तान थी 

(७९)
उसके होठों की मुस्कान कितनी भली,
ओस में जैसे भीगी हो कोई कली;
उसकी खुशबू से हर पल महकती रही,
मेरे तन की डगर मेरे मन की गली।

(८०)
रात दिन याद उसकी सताती है अब,
इक उदासी सुबह शाम छाती है अब;
मेरे कानों में बस गूँजते उसके स्वर,
जैसे आवाज़ दे कर बुलाती है अब 

(८१)
राह में हाथ में हाथ उसका रहा,
धूप में छाँह में साथ उसका रहा,
मैंने जो भी शिखर ज़िंदगी में छुआ,
पीठ पर मेरी बस हाथ उसका रहा 

(८२)
उसकी हिम्मत पे मुझ को भरोसा रहा,
उसकी ताकत पे मुझ को भरोसा रहा;
जब तलक ज़िंदगी में रही साथ वह,
मेरी किस्मत पे मुझ को भरोसा रहा 

(८३)
मेरे तन में है वह मेरे मन में है वह,
मेरे जीवन जगत के है कन कन में वह;
मैं जिधर देखता हूँ  वही दीखती ,
मेरी धरती में मेरे गगन में है वह 

(८४)
खून बन कर शिराओं में बहती है वह,
रात भर मेरे सपनों को तहती है वह;
बंद कर आँख मैं देख लेता उसे,
मेरे मन के झरोखों में रहती है वह 

(८५)
साथ रहतीं हैं अब मेरी तन्हाइयाँ,
झाँकतीं उसकी यादों की परछाइयाँ;
मैं अकेले में महसूस करता हूँ अब,
उसकी सच्चाइयाँउसकी अच्छाइयाँ।

(८६)
दिन निकलते ही अब याद आती है वह,
शाम ढलते ही अब याद आती है वह;
मेरी नस नस में उसकी हैं यादें बसीं,
दीप जलते ही अब याद आती है वह।  

(८७)
मेरे हालात को अब समझना कठिन,
मेरे ज़ज़बात को अब समझना कठिन;
एक पल भी  हटती मेरे दिल से वह,
मेरी इस बात को अब समझना कठिन।  

(८८)
उसकी यादें ही अब दिल का आधार हैं,
जोड़ते जो मुझे उससे वो तार हैं;
आँसुओं में डुबोकर कलम ने लिखे,
मेरे पिघले ह्रदय के ये उदगार हैं 

(८९)
मेरा तन मन थी वह मेरा जीवन थी वह,
मेरा दर्शन थी वह मेरा चिंतन थी वह ;
मेरे हर अध्ययन का विषय बन गई ,
मेरा अस्तित्व थी दिल की धड़कन थी वह 

(९०)
चाहता मन कि वह साथ बैठी रहे,
डाल कर हाथ में हाथ बैठी रहे;
खेलती ही रहे मेरे बालों से वह,
गोद में ले मेरा माथ बैठी रहे 

(९१)
मेरे मन पर बनी इक राँगोली थी वह,
मेरे माथे का चंदन थी रोली थी वह;
जग की हर बदनज़र से बचाकर रखा,
वो बहुत सीधी थी और भोली थी वह।  

(९२)
मेरा उसका ये रिश्ता नहीं टूटता,
संग मेरा  उसका नहीं छूटता;
तन थे दो मन मगर एक रहते सदा,
मुझसे मेरा अगर प्रभु नहीं रूठता 

(९३)
याद उसकी कभी है रुलाती मुझे,
याद उसकी कभी फ़िर हँसाती मुझे;
मेरा हर रोम महसूस करता उसे
वह छकाती मुझे गुदगुदाती मुझे।

(९४)
याद उसकी मेरे दिल से जाती नहीं,
नीद अब मेरी आँखों में आती नहीं;
रात करवट बदल कर गुजरती मेरी
दिन में चर्चा किसी की सुहाती नहीं।

(९५)
वह मेरी प्रेरणा मेरा उत्साह थी,
मन में जागी हुई इक नई चाह थी;
बन गई ज़िन्दगी इक सुहाना सफर,
जब से आकर बनी मेरी हमराह थी 

(९६)
दिन गुजरता नहीं रात कटती नहीं,
याद उसकी मेरे दिल से हटती नहीं;
मेरे तन मन में है सिर्फ़ उसकी लगन,
प्यास मिटती नहीं आस घटती नहीं।

(९७)
उसके प्राणों की कीमत समझता था मैं,
उसके आँसू की इज्जत समझता था मैं;
उसके  बिन ज़िन्दगी मेरी कुछ भी नहीं,
उसकी संगति की ताकत समझता था मैं।

(९८)
याद जाती नहीं नींद आती नहीं,
बात दुनिया की कोई भी भाती नहीं;
जिसमें होता नहीं जिक्र उसका कोई,
ऐसी चर्चा मुझे अब सुहाती नहीं।

(९९)
बात का कोई भी हल सुझाई  दे,
राह आगे की कोई दिखाई  दे;
होने लगता है बेचैन क्यों मेरा दिल,
उसकी आवाज़ जब से सुनाई  दे।

(१००)
मुझ पे छाई है बन एक उन्माद वह,
मेरी नस नस में है सिर्फ़ आबाद वह;
याद आता नहीं है कभी कोई पल,
जिसमें आई नहीं है मुझे याद वह 
,
चंद्रभान भारद्वाज





Tuesday, August 13, 2019

        पहेली हाथ में तलवार से सुलझी

न तो प्रतिकार से सुलझी नहीं परिहार से सुलझी
पुरानी वह पहेली हाथ में तलवार से सुलझी

अगर रक्खी हुई है पालकर हठधर्मिता मन में
तो उस इंसान की हर इक पहेली मार से सुलझी

लिया है जन्म जिस परिवार में भी मनमुटावों ने
पहेली उसकी आँगन में उठी दीवार से सुलझी

उलझती आ रही थी जो पहेली पुश्तों दर पुश्तों
कभी फटकार से सुलझी कभी पुचकार से सुलझी

पहेली नफरतों की दो दिलों के बीच जो पनपी
तनिक मुस्कान से सुलझी तनिक मनुहार से सुलझी  

त्रिया या कोई बच्चा यदि उतरते अपनी हठ पे जब
पहेली उनके हठ की सिर्फ कोमल प्यार से सुलझी

जहाँ संतोष ' भारद्वाज ' हो दोनों ही पक्षों में
तो उनकी हर पहेली आपसी व्यवहार से सुलझी

चन्द्रभान भारद्वाज 




Friday, July 26, 2019


                   हँसकर गुजर जाती

कभी रोकर गुजर जाती कभी हँसकर गुजर जाती
किसी के नाम से यदि ज़िंदगी जुड़कर गुजर जाती

नहीं स्वीकार करते यदि प्रणय प्रस्ताव वे अपना
उमर उनकी गली के काटकर चक्कर गुजर जाती

निगाहें खुद उठाकर सिर्फ हमको देख लेते वे
हमारी उम्र उनका नाम जप जप कर गुजर जाती  

इधर दुःख का कुआँ मिलता अभावों की उधर खाई
उमर उनमें बराबर संतुलन रखकर गुजर जाती

सुगम राहें नहीं मिलतीं सहज मंज़िल नहीं मिलती
उमर कँकरीली सब पगडंडियाँ चलकर गुजर जाती

नदी इक आग की पड़ती है प्रिय की राह में अक्सर
धधकती आग को यह ज़िंदगी पीकर गुजर जाती

अगर कठिनाइयों के ढीठ पर्बत रोकते राहें
मचलती ज़िंदगी हर इक शिखर चढ़कर गुजर जाती

सफर में सिर्फ चलती ज़िंदगी का नाम है गाड़ी
कहीं सरपट गुजर जाती कहीं रुककर  गुजर जाती

अँधेरों ने जिसे खुद आज 'भारद्वाज ' घेरा है
वही क्षितिजों पे अपना नाम चमकाकर गुजर जाती 

चंद्रभान भारद्वाज 


Friday, July 5, 2019

                  तपाओ तो सही

 ज़िंदगी को वक़्त की लौ पर तपाओ तो सही
आँच में रख प्राण को कुंदन बनाओ तो सही

एक दिन आकाश खुद आएगा धरती पर उतर
हौसलों को ऊँचे से ऊँचा उड़ाओ तो सही

हर्ष के अंकुर उगेंगे देह के हर रोम से
अपनी मिट्टी में लहू अपना मिलाओ तो सही

साफ़ दिख जाएगा इस दुनिया का चेहरा आपको
धूल अपने मन के दर्पण से हटाओ तो सही

दूर होगा एक क्षण में घुप अँधेरा राह का
आस का छोटा सा इक दीया जलाओ तो सही

रंग चटकीले लगेंगे प्रेम के विश्वास के
आँख से नफरत के सब परदे उठाओ तो सही

हर तरफ दिखने लगेगा सिर्फ 'भारद्वाज ' प्रिय
प्रेम सागर में तनिक डुबकी लगाओ तो सही

चंद्रभान भारद्वाज 

Tuesday, June 25, 2019

साँचों में ढलना आ गया है 

जिसे साँचों में ढलना आ गया है
समय के संग चलना आ गया है 

फँसेगा चक्रव्यूहों में नहीं अब
उसे बाहर निकलना आ गया है

चमकता ही रहेगा हर दिशा में
सतत दीपक सा जलना आ गया है

कहीं गाड़ी नहीं उसकी रुकेगी
सही पटरी बदलना आ गया है

जरुरत अब नहीं बैसाखियों की
कुलाँचें भर उछलना आ गया है

नए अंकुर उगें नस नस में उसकी
जिसे मिटटी में मिलना आ गया है

न उसकी नाव डूबेगी भँवर में
थपेड़ों में सँभलना आ गया है

गुलाबों में उसी की होती गिनती
जिसे काँटों में खिलना आ गया है

न 'भारद्वाज ' की हस्ती मिटेगी
उसे ग़ज़लों में ढलना आ गया है

चंद्रभान भारद्वाज 





Monday, June 3, 2019

        हवन करते करते

बुराई का पुतला दहन करते करते
जली हैं उँगलियाँ हवन करते करते

मिली हैं जमाने की आलोचनाएँ
भलाई का कोई यतन करते करते

न माया मिली है नहीं राम पाए
भटकता रहा मन भजन करते करते

पराजित नहीं सत्य को कर सकी हैं
चुकीं शक्तियाँ सब दमन करते करते

न राहें मिली हैं न मंजिल ही पाई
उमर थक गई है गमन करते करते

कमर तो झुकी हो गई टेढ़ी गर्दन
मठों मंदिरों में नमन करते करते

'भरद्वाज' लौकिक, हुआ पारलौकिक
गहन प्रेम का अध्ययन करते करते

चंद्रभान भारद्वाज