Wednesday, January 29, 2020
Monday, December 30, 2019
सरल सा हल नहीं मिलता
किसी को जल नहीं मिलता किसी को थल नहीं मिलता
ये जीवन भिन्न है टेढ़ी सरल सा हल नहीं मिलता
जगत को बाँटने में रिक्त की गंगाजली जिसने
स्वयं की मौत पर उसको ही गंगाजल नहीं मिलता
लगी है आग नफरत की धुआँ हर ओर फैला है
बुझाने आग को अब प्यार का दमकल नहीं मिलता
यहाँ जब माँगते हैं धूप तो उगता नहीं सूरज
अगर हम मांगते पानी कहीं बादल नहीं मिलता
मियां क्यों छानते हो खाक नाहक़ उस इमारत में
फटे टाटों के इक गोदाम में मखमल नहीं मिलता
कहीं इफरात के कारण अपच से पेट रोगी है
कहीं बच्चों के भूखे पेट को चावल नहीं मिलता
किसी ने फाड़ कर टुकड़ा कभी बाँधा था घावों पर
तलाशा उम्र भर वह रेशमी आँचल नहीं मिलता
मिलन की आस में जब बैठती श्रृंगार करने वो
कभी बिंदी नहीं मिलती कभी काजल नहीं मिलता
अधजली लाश भारद्वाज बिन पहचान रह जाती
अगर झाड़ी में उसके कान का कुण्डल नहीं मिलता
चंद्रभान भारद्वाज
Wednesday, November 6, 2019
ग़ज़ल
प्राणों का तप्त सूरज पहुँचा ढलान पर है
चाहों का पंछी लेकिन ऊँची उड़ान पर है
सोने का उनका पिंजड़ा तिनकों का नीड़ अपना
अस्तित्व अपना हर पल अब इम्तिहान पर है
पैदा जहाँ हुआ था पाला गया जहाँ था
महलों से गर्व ज्यादा कच्चे मकान पर है
जो चोटियों पे चढ़कर अब आसमान छूते
उनकी निगाह अब भी मेरे मचान पर है
काटी उन्होंने सबसे पहले ज़बान मेरी
अपराध सिद्ध करना मुझ बेज़बान पर है
अब तक भी आँख मछली की बेध वे न पाए
यों तीर उनका अब तक रक्खा कमान पर है
पत्थर को वक़्त ने क्या हीरा बना दिया है
यह भारद्वाज सब कुछ विधि के विधान पर है
चंद्रभान भारद्वाज
सोने का उनका पिंजड़ा तिनकों का नीड़ अपना
अस्तित्व अपना हर पल अब इम्तिहान पर है महलों से गर्व ज्यादा कच्चे मकान पर है
काटी उन्होंने सबसे पहले ज़बान मेरी
अब तक भी आँख मछली की बेध वे न पाए
पत्थर को वक़्त ने क्या हीरा बना दिया है
Thursday, September 19, 2019
वाहवाही भी यहाँ
है गरीबी भी यहाँ तो राजशाही भी यहाँ
आह होठों पर रही तो वाहवाही भी यहाँ
इक तरफ उँगली के इक संकेत पर सुविधा सभी
इक तरफ जीवन को पग पग पर तबाही भी यहाँ
बोलने का और लिखने का तो हक़ है आपको
कुर्सियों की पर खिलाफत की मनाही भी यहाँ
देखने में लग रहा है इक बड़ा जनतंत्र है
अनदिखी लेकिन रही है तानाशाही भी यहाँ
सत्य फाँसी पर टँगा है इक गवाही के बिना
झूठ ने लेकिन खरीदी हर गवाही भी यहाँ
कर वसूली का प्रजा से राज्य को अधिकार है
नोंक पर बंदूक की होती उगाही भी यहाँ
खेल कर खुद जान पर कुछ कर्म अपना कर रहे
और कुछ कर्तव्य में करते कोताही भी यहाँ
ज़िंदगी में रोप जाना एक पौधा प्यार का
छाँह में ठहरे जहाँ पंछी भी राही भी यहाँ
देह 'भारद्वाज ' इक दिन पंचतत्वों में मिले
आत्मा की रहती है पर आवाजाही भी यहाँ
चंद्रभान भारद्वाज
Friday, August 30, 2019
बदलती अचानक दिशा जब हवा भी
बदलती अचानक दिशा जब हवा भी
बिना बरसे उड़ती उमड़ती घटा भी
न जाने किया कौन सा जुर्म उसने
न मिलती रिहाई न मिलती सजा भी
कदम लाँघ आए हैं जब देहरी को
दिखी अपनी मंजिल दिखा रास्ता भी
जो कर कर के नेकी बहाता नदी में
उमर भर वही शख्स फूला फला भी
विषय प्रेम का एक अदभुत विषय है
स्वयं रोग भी है स्वयं ही दवा भी
मिली डाक में प्रेम-पाती भी ऐसी
न प्रेषक लिखा था न उसका पता भी
जता व्यस्तता वो 'भरद्वाज ' अपनी
ढली रात आया था तड़के गया भी
चंद्रभान भारद्वाज
Tuesday, August 27, 2019
दिल अगर फूल सा नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता,
प्यार में यूँ दिया नहीं होता।
प्यार की लौ सदा जली रहती,
भले दीया जला नहीं होता।
एक सौदा है सिर्फ़ घाटे का,
प्यार में कुछ नफा नहीं होता।
रात करवट बदल गुजरती है,
दिन का कुछ सिलसिला नहीं होता।
ज़िन्दगी भागती ही फिरती है,
प्यार का घर बसा नहीं होता।
लोग सदियों की बात करते हैं,
एक पल का पता नहीं होता।
पहले हर बात का भारोसा था,
अब किसी बात का नहीं होता।
प्यार का हर धडा बराबर है,
कोई छोटा बड़ा नहीं होता।
पूरी लगती न 'भारद्वाज' ग़ज़ल,
प्यार जब तक रमा नहीं होता।
चंद्रभान भारद्वाज
Sunday, August 25, 2019
परिचय एवं फोटो
नाम- चंद्रभान भारद्वाज
जन्म - ४, जनवरी , १९३८।
स्थान- गोंमत (अलीगढ) (उ प्र।)
अभी तक मेरे छः ग़ज़ल संग्रह तथा एक मुक्तक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। (१) पगडंडियाँ (२)शीशे की किरचें (३)चिनगारियाँ(४)हवा आवाज़ देती है. (५)हथेली पर अँगारे तथा (६) उजाले क्या अँधेरे (ग़ज़ल संग्रह ) (७) प्रणय-शतक (मुक्तक संग्रह ) तथा पाँच संग्रहों में गज़लें सम्मिलित हैं।
देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में गज़लें प्रकाशित होती रहीं हैं। आकाशवाणी से भी रचनाओं
का प्रसारण होता रहा है। १९७० से अनवरत रूप से ग़ज़ल लेखन में संलग्न हूँ।
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