Monday, June 6, 2011

बना दिया

हालात ने तकदीर का मारा बना दिया 
पर शायरी ने आँख का तारा बना दिया 

कुछ चाहतों ने तो उमर को पर लगा दिए 
कुछ हसरतों ने एक बनजारा बना दिया 

जलते दिये अक्सर हवाओं ने बुझा दिए
चिनगारियों को यार अंगारा बना दिया 

जब तक नदी बनकर रहा मीठा बना रहा 
सागर बना तो पानी भी खारा बना दिया 


मालूम है उसको किसे किस रूप में रखे 
हीरा कोई  शीशा कोई पारा बना दिया

यह ज़िन्दगी क्या क्या बनाएगी अभी हमें 
अच्छा भला इंसान बेचारा बना दिया 

कुछ देर पहले तक जो 'भारद्वाज' आम था 
उसकी निगाह ने उसे न्यारा बना दिया 


चंद्रभान भारद्वाज 

Sunday, May 22, 2011

जब कहीं दिलबर नहीं होता

इक ज़िन्दगी में जब कहीं दिलबर नहीं होता 
होते दरो-दीवार तो पर घर नहीं होता 

 जिसकी नसों में आग का दरिया न बहता हो 
काबिल भले हो वह मगर शायर नहीं होता 

 लहरें न  उठतीं हों नहीं तूफ़ान ही आते
सूखा हुआ तालाब इक  सागर नहीं होता

 जो नब्ज पहचाने न समझे धड़कनें दिल की 
होता है सौदागर वो चारागर नहीं होता 

  उमड़ीं घटायें जब कभी बिन प्यार के बरसीं 
तन भीग जाता है मगर मन  तर नहीं होता 

 यादों की खुशबू से अगर दालान भर जाते
गुलज़ार सपनों का महल खँडहर नहीं होता 

 यदि प्यार के बीजों में अंकुर फूटते पहले 
तो खेत 'भारद्वाज' का बंजर नहीं होता   

 चंद्रभान भारद्वाज 

Wednesday, May 18, 2011

दुनिया है थोथे रिश्तों की

भेंट लिफाफों गुलदस्तों की 
दुनिया है थोथे रिश्तों की 

तोलें सिर्फ तराजू लेकर 
यारी भी पुश्तों पुश्तों की 

सत्ता चलती है बस्ती में 
चोर उचक्कों अलमस्तों की 

भोग रहा कन्धों पर पीड़ा 
बचपन बोझीले बस्तों की 

लूटा ऐ टी ऍम शहर में 
खोली पोल पुलिस गश्तों की 

बरदी  बत्ती बेबस लगतीं 
बदहालत है चौरस्तों की 

'भारद्वाज'  हुआ है दुबला 
चिंता में मासिक किश्तों की 

चंद्रभान भरद्वाज



Monday, April 18, 2011

अच्छा लगा

मस्तियों शैतानियों का दौर ही अच्छा लगा 
ज़िन्दगी में आप थे तो और ही अच्छा लगा 

आज लगते हैं हमें रसहीन छप्पन भोग भी 
आप के हाथों का सूखा कौर ही अच्छा लगा 

अब ख़ुशी देता नहीं सिर पर मुकुट रतनों जड़ा
आप से पहना खजूरी मौर ही अच्छा लगा 

राह में चलते समय पद चिन्ह देखे आपके 
तो हमें सुनसान सा वह ठौर ही अच्छा लगा 

आप बिन भाती नहीं फलती हुई अमराइयाँ
आप थे तो ठूँठ इक बिन बौर ही अच्छा लगा 

जब कभी तनहाइयों में याद आती आपकी
तब पलक पर आँसुओं का दौर ही अच्छा लगा 

यार 'भारद्वाज' अब  न्यूयार्क पेरिस कुछ नहीं
आप के सँग तो हमें इंदौर ही अच्छा लगा

चंद्रभान भारद्वाज



Friday, March 18, 2011

वो राख में सुलगती इक आग ढूँढ़ते हैं

पानी में दूध जैसे ही झाग ढूँढ़ते हैं
वो राख में सुलगती इक आग ढूँढ़ते हैं

फूलों की क्यारियाँ तो रख़ दीं उजाड़ कर सब
काँटों की झाड़ियों में वो पराग ढूँढ़ते हैं 

खेलों में खोया बचपन  रंगरेलियों में यौवन  
अब आखिरी क्षणों में वैराग ढूँढ़ते हैं

आदी हैं हाथ जिसके बन्दूक बम छुरों के
पत्थर के उस ह्रदय में अनुराग ढूँढ़ते हैं 

उम्मीद क्या करें अब इंसानियत की उनसे  
जो ह़र लहू के कतरे में फाग ढूँढ़ते हैं

रक्खे थे  जिंदगी भर माँ-बाप आश्रमों में 
करने को श्राद्ध उनका अब काग ढूँढ़ते हैं

पूरी रँगी हुई है कालिख से खुद की चादर
औरों की साफ़ चादर में दाग ढूँढ़ते हैं

पाला हुआ ह्रदय में भ्रम और संशयों को
अब सिर्फ आस्तीनों में नाग ढूँढ़ते हैं

ले नाम रोशनी का करता रहा छलावा
जिसने ये घर जलाया वो चिराग ढूँढ़ते हैं

मुश्किल हुआ है जीना और आबरू बचाना
पग पग पे अपना आँचल और पाग ढूँढ़ते हैं

हैं छंद गीत ग़ज़लों से 'भारद्वाज' रीते
वे गद्य की कड़ी में ही राग ढूँढ़ते  हैं

चंद्रभान भारद्वाज

Sunday, February 6, 2011

कोई नहीं दिखता

बबूलों के वनों में गुलमोहर कोई नहीं दिखता
डगर में छाँह दे ऐसा शजर कोई नहीं दिखता

भटकती ही रही है ज़िन्दगी इस दर से उस दर तक
जिसे चाहत रही अपनी वो दर कोई नहीं दिखता

चले थे सोच कर शायद बनेगा कारवाँ आगे
खड़े हैं बस अकेले हम बशर  कोई नहीं दिखता

रहा आवाज़ का धोखा कि धोखा है निगाहों का
जिधर आवाज़ आती है उधर कोई नहीं दिखता

दिया बनकर जली है उम्र सारी इक प्रतीक्षा में
चुकी बाती बुझा दीया मगर कोई नहीं दिखता

कहीं थे राह में रोड़े कहीं थी  पाँव में बेडी
मगर अपने इरादों पर असर कोई नहीं दिखता

यहाँ कुछ लोग 'भारद्वाज' लिखने में लगे गज़लें
गज़लगोई का पर उनमें हुनर कोई नहीं दिखता

चंद्रभान भारद्वाज