Monday, April 18, 2011

अच्छा लगा

मस्तियों शैतानियों का दौर ही अच्छा लगा 
ज़िन्दगी में आप थे तो और ही अच्छा लगा 

आज लगते हैं हमें रसहीन छप्पन भोग भी 
आप के हाथों का सूखा कौर ही अच्छा लगा 

अब ख़ुशी देता नहीं सिर पर मुकुट रतनों जड़ा
आप से पहना खजूरी मौर ही अच्छा लगा 

राह में चलते समय पद चिन्ह देखे आपके 
तो हमें सुनसान सा वह ठौर ही अच्छा लगा 

आप बिन भाती नहीं फलती हुई अमराइयाँ
आप थे तो ठूँठ इक बिन बौर ही अच्छा लगा 

जब कभी तनहाइयों में याद आती आपकी
तब पलक पर आँसुओं का दौर ही अच्छा लगा 

यार 'भारद्वाज' अब  न्यूयार्क पेरिस कुछ नहीं
आप के सँग तो हमें इंदौर ही अच्छा लगा

चंद्रभान भारद्वाज



Friday, March 18, 2011

वो राख में सुलगती इक आग ढूँढ़ते हैं

पानी में दूध जैसे ही झाग ढूँढ़ते हैं
वो राख में सुलगती इक आग ढूँढ़ते हैं

फूलों की क्यारियाँ तो रख़ दीं उजाड़ कर सब
काँटों की झाड़ियों में वो पराग ढूँढ़ते हैं 

खेलों में खोया बचपन  रंगरेलियों में यौवन  
अब आखिरी क्षणों में वैराग ढूँढ़ते हैं

आदी हैं हाथ जिसके बन्दूक बम छुरों के
पत्थर के उस ह्रदय में अनुराग ढूँढ़ते हैं 

उम्मीद क्या करें अब इंसानियत की उनसे  
जो ह़र लहू के कतरे में फाग ढूँढ़ते हैं

रक्खे थे  जिंदगी भर माँ-बाप आश्रमों में 
करने को श्राद्ध उनका अब काग ढूँढ़ते हैं

पूरी रँगी हुई है कालिख से खुद की चादर
औरों की साफ़ चादर में दाग ढूँढ़ते हैं

पाला हुआ ह्रदय में भ्रम और संशयों को
अब सिर्फ आस्तीनों में नाग ढूँढ़ते हैं

ले नाम रोशनी का करता रहा छलावा
जिसने ये घर जलाया वो चिराग ढूँढ़ते हैं

मुश्किल हुआ है जीना और आबरू बचाना
पग पग पे अपना आँचल और पाग ढूँढ़ते हैं

हैं छंद गीत ग़ज़लों से 'भारद्वाज' रीते
वे गद्य की कड़ी में ही राग ढूँढ़ते  हैं

चंद्रभान भारद्वाज

Sunday, February 6, 2011

कोई नहीं दिखता

बबूलों के वनों में गुलमोहर कोई नहीं दिखता
डगर में छाँह दे ऐसा शजर कोई नहीं दिखता

भटकती ही रही है ज़िन्दगी इस दर से उस दर तक
जिसे चाहत रही अपनी वो दर कोई नहीं दिखता

चले थे सोच कर शायद बनेगा कारवाँ आगे
खड़े हैं बस अकेले हम बशर  कोई नहीं दिखता

रहा आवाज़ का धोखा कि धोखा है निगाहों का
जिधर आवाज़ आती है उधर कोई नहीं दिखता

दिया बनकर जली है उम्र सारी इक प्रतीक्षा में
चुकी बाती बुझा दीया मगर कोई नहीं दिखता

कहीं थे राह में रोड़े कहीं थी  पाँव में बेडी
मगर अपने इरादों पर असर कोई नहीं दिखता

यहाँ कुछ लोग 'भारद्वाज' लिखने में लगे गज़लें
गज़लगोई का पर उनमें हुनर कोई नहीं दिखता

चंद्रभान भारद्वाज

Tuesday, February 1, 2011

कौन देखता है

टूटे हुए मचानों को कौन देखता है
उजड़े पड़े मकानों को कौन देखता है

भर तो दिए  समय ने पर दर्द है अभी तक
घावों के उन निशानों को कौन देखता है

बारात जा चुकी है और उठ चुकी है डोली
अब सूने शामियानों को कौन देखता है

महफ़िल में सब निगाहें बस मंच पर टिकी हैं
नीचे के पायदानों को कौन देखता है

आते रहें उजाले मिलती रहे हवा भी
ऐसे उजालदानों को कौन देखता है

बनने को खीर पहले जो आग पर चढ़े थे
उन चावलों मखानों को कौन देखता है

गा गा के जिनको झेलीं थीं लाठियाँ और गोली
अब उन अमर तरानों को कौन देखता है

सब देखते दरीचे दालान और गुम्बद
पर नीव की चटानों को कौन देखता है

बलिदान हो गए हैं जो सरहदों की खातिर
उन वीरों उन जवानों को कौन देखता है

कन्धों से दूसरों के बस साधते निशाना
अब तीर या कमानों को कौन देखता है

पानी रुका है ऊपर नीचे है रेत केवल
नदियों के उन मुहानों को कौन देखता है

तुमको दिखाना होगा खुद वर्तमान अपना
गुज़रे हुए ज़मानों को कौन देखता है

डाली हुई सियासत की 'भारद्वाज' दिल में
नफ़रत की अब गठानों को कौन देखता है

चंद्रभान भारद्वाज

Saturday, January 8, 2011

बहुत होता है

थोड़ा सम्मान बहुत होता है
मान का पान बहुत होता है

मृत्यु के बाद भले हो मिट्टी
देह का दान बहुत होता है

भेंट का मोल न आँका जाता
मुट्ठी भर धान बहुत होता है

लोग पाते हैं सफलता थोड़ी
उसका अभिमान बहुत होता है

भेद दीवार परे लेने को
सिर्फ इक कान बहुत होता है

टालने कोई बड़ी दुर्घटना
थोड़ा सा ध्यान बहुत होता है

पढ़ के अखबार अदालत लेले
कोई संज्ञान बहुत होता है

प्यार का पाठ बहुत है मुश्किल 
इसमें इम्तिहान बहुत होता है

ज़िन्दगी मिलती है 'भारद्वाज' तनिक
साजो-सामान बहुत होता है

चंद्रभान भारद्वाज

Wednesday, November 10, 2010

पूरी उमर खपा दी इक घर तलाशने में

पग भर ज़मीन डग भर अंबर तलाशने में
पूरी उमर खपा दी इक घर तलाशने में

पल प्यार के गँवाए बस देखने में दरपन
श्रृंगार   के   गँवाए   जेवर  तलाशने   में

करते रहे हैं वादा वो ताज के लिए पर
अटके   हुए  हैं  संगेमरमर   तलाशने   में

चट्टान काट आई मैदान लाँघ आई
बालू हुई नदी अब सागर तलाशने में

तम से भरी डगर से तो  आगए निकलकर
भटके तेरी गली में तेरा दर तलाशने में

नीलाम  हो गया है अपना हरेक सपना
तेरी शान में  दमकते गौहर तलाशने में 

सब चूर चूर होते हैं ख्वाब लड़कियों के
होती है भूल कोई जब वर तलाशने में

करवट बदल बदल कर कटती है रात बाकी
जब नीद टूटती है बिस्तर तलाशने में

माया के जाल में अब वे भी फँसे हुए हैं
रहना था लीन जिनको ईश्वर तलाशने में

मंदिर बनाने वाले मस्जिद बनाने वाले
उलझे हुए हैं अबतक पत्थर तलाशने में

वह मिल नहीं सकेगा तुम्हें  'भारद्वाज' बाहर
पाओगे उसको अपने अंदर तलाशने में

चंद्रभान भारद्वाज

Sunday, October 31, 2010

खड़े रहकर क़तारों में भी अब बारी नहीं आती

खड़े रहकर क़तारों में भी अब बारी नहीं आती
हमें क्रम तोड़ बढ़ने की कलाकारी नहीं आती

गँवा कर उम्र सारी हम लुटा बैठे हैं तन मन धन
वो कहते हैं हमें रस्मे वफादारी नहीं आती

उतरती आत्मा पहले किसी किरदार के अंदर
अदा संवाद करने से अदाकारी नहीं आती 

कलम को डूबना पड़ता लहू में और आँसू में 
फ़क़त कुछ शब्द रचने से गज़लकारी नहीं आती

नहीं रखता है जो इंसान अपने पाँव धरती पर  
उसे  खाए बिना  ठोकर समझदारी नहीं आती 

पिरोते हैं सुई में प्रेम के भी रेशमी धागे 
न हों वे रेशमी धागे तो गुलकारी नहीं आती 

स्वयं बनता है मिट्टी एक माली मिलके मिट्टी में 
महज बीजों से 'भारद्वाज' फुलवारी नहीं आती 

चंद्रभान भारद्वाज