Tuesday, October 27, 2015

माहौल बेरुख़ी का बद इस कदर न देखा 

माहौल बेरुख़ी का बद इस कदर न देखा 
वह सामने खड़ा था लेकिन इधर न देखा 

पिघला हृदय न उसका गीली हुईं न आँखें 
इस आह में तो हमने कुछ भी असर न देखा 

उसने दिया तो हमने वो प्याला पी लिया था 
अमृत भरा था उसमें या था ज़हर न देखा 

जब आग में गली के सब घर ही जल रहे थे 
उसका तो घर बचाया पर अपना घर न देखा 

इक आदमी की हत्या होती रही सड़क पे 
पर भीड़ में किसी ने मुड़कर उधर न देखा 

आँगन के बीच जिसके दीवार हो न कोई 
कोई भी आज ऐसा पुश्तैनी घर न देखा 

कदमों के हौसलों ने जिसको छुआ नही हो 
पृथ्वी पे इतना ऊँचा कोई शिखर न देखा 

जिसकी जड़ों में गहरे तक दीमकें लगी हों 
पकता हुआ कोई फल उस पेड़ पर न देखा 

इंसान ऐसा कोई दुनिया में मिल न पाया 
खुद 'भारद्वाज' जिसने गम उम्र भर न देखा 

चंद्रभान भारद्वाज  

Tuesday, September 15, 2015

अपना तो ध्यान अपने पिया में लगा रहा
अपना तो ध्यान अपने पिया में लगा रहा
बस नेकी और राहे-वफ़ा में लगा रहा
भगवान उसको माफ़ करे दीन जानकर
जो हर कदम गुनाहो-दगा में लगा रहा
वह ज़िंदगी से मेरी गया तोड़ सिलसिला
पर मैं तो अपने वादे-वफ़ा में लगा रहा
जब नाव उसकी जा के फँसी बीच धार में
‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’
मधुमेह रक्तचाप के झंझट से बच गया
मैं सुब्हो-शाम योग-क्रिया में लगा रहा
पद से तो कार्यमुक्त किया उम्र ने मुझे
पर मैं ग़ज़ल की रम्य विधा में लगा रहा
मुझ को न कोई ज्ञान है गीता क़ुरान का
मैं ज़िंदगी की रामकथा में लगा रहा
अँग्रेज़ी दवा ने किया कोई न जब असर
दादी की दी घरेलू दवा में लगा रहा
आँखों से ‘भरद्वाज’ मिली आँख तो मगर
मेरा वजूद शर्मो-हया में लगा रहा
चंद्रभान भारद्वाज
रसोई की महक उड़कर गली के पार तक पहुँची

रसोई की महक उड़कर गली के पार तक पहुँची
किसी के प्यार की खुशबू हमारे द्वार तक पहुँची

ज़माने की निगाहों से छिपा रक्खी थी अरसे से
न जाने राज़ की वो बात कब अख़बार तक पहुँची

सहा करती थीं घुट घुट कर लड़कियाँ छेड़खानी को
मगर अब बात सड़कों से निकल दरबार तक पहुँची

घृणा की एक चिनगारी दबी थी राख में अब तक
हवा की सह से लपटों के महा आकार तक पहुँची

चढ़े जब रेल में तो पाँव रखने को जगह माँगी
सफ़र में बात आगे सीट पर अधिकार तक पहुँची

वसूली की थी चौराहे पे जितनी भी सिपाही ने
नियत अनुपात में बँटकर वो थानेदार तक पहुँची

रुकी साँसें थमी जब धड़कनें भी दिल की सीने में
निकल कर बोतलों से तब दवा बीमार तक पहुँची

चुभाकर डंक शब्दों के उगलती है ज़हर मुँह से
सियासत आदमी से साँप के किरदार तक पहुँची

लगी थीं दीमकें जो अब तलक बस पेड़ की जड़ में
तने से चढ़  के 'भारद्वाज' अब हर डार तक पहुँची

चंद्रभान भारद्वाज  

Thursday, July 2, 2015




परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की  

परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की 
पड़ी है मार झेलनी कटार  या अँगार की  

खुली है आँख जब किया है सूर्य का मुक़ाबला  
ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की  

उतर गया है आव तो निगाह से उतर गया  
जहाँ में पूछ-ताछ सिर्फ़ होती आवदार की  

झरे थे फूल कल तलक तो उनके शब्द शब्द से  
उन्हीं के होंठ आज बात कर रहे हैं खार की  

ये दोष वक़्त का रहा कि दोष है हकीम का  
मरीज़ सन्निपात का दवाई दी बुखार की  

बँधी रहीं थी जब तलक तो खुद ही शक्ति बन गईं  
खुलीं तो खाक की हुईं वो मुट्ठियाँ हज़ार की  

चमन को जो उजाड़ने के खुद जवाबदार थे  
बता रहें हैं आजकल वो हर कमी बहार की  

समझ सकेंगे वो कहाँ है ज़िंदगी का अर्थ क्या  
जिए हैं उम्र भर स्वयं जो ज़िंदगी उधार की  

बताएँ 'भारद्वाज' क्या है हाल अब वियोग में  
सदी सी लग रही है इक घड़ी भी इंतज़ार की  

चंद्रभान भारद्वाज  

Wednesday, May 13, 2015

टूटे हुए रिश्तों का कोई हल न मिलेगा 

टूटे  हुए रिश्तों का कोई हल न मिलेगा
इक प्यार में भीगा हुआ आँचल न मिलेगा

बाँधा हुआ था स्नेह  की इक डोर से जिसने
बाँहों के उस घेरे का फिर संबल न मिलेगा

जो ज़िन्दगी की राह में पग पग पे पिया था
उन शरबती आँखों का गंगाजल न मिलेगा

मिलने  को तो मिल जाएंगे हमदर्द हजारों 
आँखों में उनकी  प्यार का काजल न मिलेगा

जिसने कभी अाहुति नहीं दी  प्रेम हवन में 
उसको प्रसादी का अमर श्रीफल  न मिलेगा

आया हुआ हो  द्वार पर अवसर न  गँवाना
लौटा अगर वो आज तो फिर कल न मिलेगा

परदेश में दौलत तो 'भारद्वाज' मिलेगी
पर छाँह दे वो नीम या पीपल न मिलेगा

चंद्रभान भारद्वाज


Saturday, May 2, 2015

                  पूजा घर बना दिया 

वीरान दिल को एक पूजा घर बना दिया 
इक बूँद को भी प्यार का सागर बना दिया 

ठोकर लगी थी राह में जिससे कभी हमें 
हमने उसी को मील का पत्थर बना दिया 

रातों को गहरी नींद की चिंता नहीं रही 
हाथों का तकिया देह का बिस्तर बना दिया 

जिसकी वजह से कल दिलों में फासले हुए 
आँगन की उस दीवार में इक दर बना दिया 

आकाश की ऊँचाइयों को छू सकें कभी 
सोये हुए हर हौसले को पर बना दिया 

थक हार कर जो रुक गए थे राह में कहीं 
इक प्रेरणा से जीत का अवसर बना दिया 

गुम हो गया था जो समय के गर्त में कहीं 
उस नाम का सोने का हर अक्षर बना दिया 

घर का पता कोई न कोई गाँव  का पता 
इस ज़िन्दगी ने हमको यायावर बना दिया 

तक़दीर के भी खेल 'भारद्वाज' हैं अजब 
नौकर को मालिक मालिक को नौकर बना दिया 

चंद्रभान भारद्वाज 

Wednesday, April 22, 2015

ग़ज़ल 

चेहरे पे कांति प्यार की छाई हुई तो है 
हर याद उसकी मन में सवाई हुई तो है 

हमको समय ने बाँध के रक्खा अलग अलग 
पर हमने प्रीति -रीति निभाई हुई तो है 

मजबूरियों ने पास तो आने नहीं दिया 
पर अपनी हर ग़ज़ल में वो आई हुई तो है 

ये बात अलग है कि वो भर ही नहीं सका 
ये जख्मे  दिल है इसकी दवाई हुई तो है 

चहरे पे मुस्कराहट हरदम बनी रही 
अपनी कभी कभी यों  लड़ाई हुई तो है 

आते ही उसके वज़्म में धुन भूल ही गए 
यों उसके पहले धुन ये बजाई  हुई तो है 

लगते भले हों देह से वो पास पास हैं  
उनके दिलों के बीच इक खाई हुई तो है 

क्या क्या प्रमाण देगा वो अपनी सफाई में 
हर ओर उसने आग लगाई हुई तो है 

वो नाम ले के अपना सुनाने चले ग़ज़ल 
जो 'भारद्वाज ' जी ने सुनाई हुई तो है 

चंद्रभान  भारद्वाज