Thursday, July 2, 2015




परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की  

परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की 
पड़ी है मार झेलनी कटार  या अँगार की  

खुली है आँख जब किया है सूर्य का मुक़ाबला  
ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की  

उतर गया है आव तो निगाह से उतर गया  
जहाँ में पूछ-ताछ सिर्फ़ होती आवदार की  

झरे थे फूल कल तलक तो उनके शब्द शब्द से  
उन्हीं के होंठ आज बात कर रहे हैं खार की  

ये दोष वक़्त का रहा कि दोष है हकीम का  
मरीज़ सन्निपात का दवाई दी बुखार की  

बँधी रहीं थी जब तलक तो खुद ही शक्ति बन गईं  
खुलीं तो खाक की हुईं वो मुट्ठियाँ हज़ार की  

चमन को जो उजाड़ने के खुद जवाबदार थे  
बता रहें हैं आजकल वो हर कमी बहार की  

समझ सकेंगे वो कहाँ है ज़िंदगी का अर्थ क्या  
जिए हैं उम्र भर स्वयं जो ज़िंदगी उधार की  

बताएँ 'भारद्वाज' क्या है हाल अब वियोग में  
सदी सी लग रही है इक घड़ी भी इंतज़ार की  

चंद्रभान भारद्वाज  

Wednesday, May 13, 2015

टूटे हुए रिश्तों का कोई हल न मिलेगा 

टूटे  हुए रिश्तों का कोई हल न मिलेगा
इक प्यार में भीगा हुआ आँचल न मिलेगा

बाँधा हुआ था स्नेह  की इक डोर से जिसने
बाँहों के उस घेरे का फिर संबल न मिलेगा

जो ज़िन्दगी की राह में पग पग पे पिया था
उन शरबती आँखों का गंगाजल न मिलेगा

मिलने  को तो मिल जाएंगे हमदर्द हजारों 
आँखों में उनकी  प्यार का काजल न मिलेगा

जिसने कभी अाहुति नहीं दी  प्रेम हवन में 
उसको प्रसादी का अमर श्रीफल  न मिलेगा

आया हुआ हो  द्वार पर अवसर न  गँवाना
लौटा अगर वो आज तो फिर कल न मिलेगा

परदेश में दौलत तो 'भारद्वाज' मिलेगी
पर छाँह दे वो नीम या पीपल न मिलेगा

चंद्रभान भारद्वाज


Saturday, May 2, 2015

                  पूजा घर बना दिया 

वीरान दिल को एक पूजा घर बना दिया 
इक बूँद को भी प्यार का सागर बना दिया 

ठोकर लगी थी राह में जिससे कभी हमें 
हमने उसी को मील का पत्थर बना दिया 

रातों को गहरी नींद की चिंता नहीं रही 
हाथों का तकिया देह का बिस्तर बना दिया 

जिसकी वजह से कल दिलों में फासले हुए 
आँगन की उस दीवार में इक दर बना दिया 

आकाश की ऊँचाइयों को छू सकें कभी 
सोये हुए हर हौसले को पर बना दिया 

थक हार कर जो रुक गए थे राह में कहीं 
इक प्रेरणा से जीत का अवसर बना दिया 

गुम हो गया था जो समय के गर्त में कहीं 
उस नाम का सोने का हर अक्षर बना दिया 

घर का पता कोई न कोई गाँव  का पता 
इस ज़िन्दगी ने हमको यायावर बना दिया 

तक़दीर के भी खेल 'भारद्वाज' हैं अजब 
नौकर को मालिक मालिक को नौकर बना दिया 

चंद्रभान भारद्वाज 

Wednesday, April 22, 2015

ग़ज़ल 

चेहरे पे कांति प्यार की छाई हुई तो है 
हर याद उसकी मन में सवाई हुई तो है 

हमको समय ने बाँध के रक्खा अलग अलग 
पर हमने प्रीति -रीति निभाई हुई तो है 

मजबूरियों ने पास तो आने नहीं दिया 
पर अपनी हर ग़ज़ल में वो आई हुई तो है 

ये बात अलग है कि वो भर ही नहीं सका 
ये जख्मे  दिल है इसकी दवाई हुई तो है 

चहरे पे मुस्कराहट हरदम बनी रही 
अपनी कभी कभी यों  लड़ाई हुई तो है 

आते ही उसके वज़्म में धुन भूल ही गए 
यों उसके पहले धुन ये बजाई  हुई तो है 

लगते भले हों देह से वो पास पास हैं  
उनके दिलों के बीच इक खाई हुई तो है 

क्या क्या प्रमाण देगा वो अपनी सफाई में 
हर ओर उसने आग लगाई हुई तो है 

वो नाम ले के अपना सुनाने चले ग़ज़ल 
जो 'भारद्वाज ' जी ने सुनाई हुई तो है 

चंद्रभान  भारद्वाज 

Friday, March 13, 2015

प्यार में यार की हर बात भली लगती है 

राह काँटों से भरी कुंजगली लगती है 
प्यार में यार की हर बात भली लगती है 

विष में डूबी हुई हीरे की कनी भी कोई 
होठ को छूते ही मिसरी की डली लगती है

छत से जो लटकी हुई डाल गले में फंदा
प्यार के खेल में शायद वो छली लगती है 

गाँव के ताल में था तैर रहा शव जिसका 
लाज की मारी हुई रामकली लगती है 

पुत्र की आस में जब जन्म दिया बेटी को
सास को अपनी बहू कर्मजली लगती है 

जब से बीमार के सिरहाने वो आकर बैठा 
द्वार तक आई हुई मौत टली लगती है 

थाम  कर हाथ अगर साथ 'भरद्वाज' रहे 
काजू बादाम सी हर मूँगफली लगती है 

चंद्रभान भारद्वाज 


Tuesday, February 17, 2015

एक बंधन से उबर जाना है
एक बंधन से उबर जाना है
द्वार दीवार में कर जाना है
फूल से निकली हुई ख़ुश्बू सा
अब हवाओं में बिखर जाना है
नाम को याद रखेंगी सदियाँ
आज हर दिल में उतर जाना है
राह ख़ुद बनती चली जायेगी
बढ़ते क़दमों को जिधर जाना है
जान अब अपनी हथेली पे रखी
‘आज हर हद से गुजर जाना है’
मृत्यु पर गर्व करेगा जीवन
प्यार में डूब के तर जाना है
डाल के सूखे हुए पत्ते को
क्या पता गिर के किधर जाना है
बाद में ताजमहल बनते हैं
पहले मिट्टी में उतर जाना है
आँसुओं को भी बनाता मोती
जिसने ग़ज़लों का हुनर जाना है
रैलियाँ उनकी निकल जाने पर
सिर्फ सन्नाटा पसर जाना है
चढ़ गया गहरा नशा नज़रों का
धीरे धीरे ही असर जाना है
साज सामान सँभालो अपना
अब ‘भरद्वाज’ को घर जाना है
चंद्रभान भारद्वाज                

            भीतर की कसक बाकी है 

भर गए घाव तो भीतर की कसक बाकी है 
फाँस जो मन में चुभी आज तलक बाकी है 

हमने ईमान से बस इतना कमाया अबतक 
सिर पे पगड़ी है निगाहों में चमक बाकी  है 

ज़िंदगी जल के भले राख का इक ढेर हुई 
राख के ढेर में  अब तक भी भभक बाकी है 

आस तो टूट रही छूट रहीं सांसें भी 
ज़िंदगी जीने की पर अब भी  ललक बाकी है 

उनको नज़रों से हुए दूर ज़माना गुजरा 
अपनी साँसों में मगर उनकी महक बाकी है 

दाल सब्ज़ी तो हुए आज बजट से बाहर 
पर गनीमत है कि रोटी पे नमक बाकी है 

गाँव तो अपना नए बाँध के कारण डूबा 
पर उसी नाम से बस कच्ची सड़क बाकी है 

नाम अपना भी बराबर का लिखा था पहले 
अब वसीयत में न हिस्सा है न हक़ बाकी है 

पाँव छूते  हैं 'भरद्वाज' वही  मंजिल को 
राह में जिनको न संभ्रम है न शक बाकी है 

चंद्रभान भारद्वाज