Monday, January 19, 2015

                     चलना छोड़ देंगे क्या              

बिछे हों राह में काँटे तो चलना छोड़ देंगे क्या 
किसी के डर से हम घर से निकलना छोड़ देंगे क्या 

भले बरसात हो आँधी  हो या तूफ़ान हो कोई 
उगे जो क्यारियों में फूल खिलना छोड़ देंगे क्या 

वे अपने मन के राजा हैं उन्हें हक़ है मचलने का 
बड़ों की डांट से बच्चे मचलना छोड़ देंगे क्या 

किसी की चेन झपटी है किसी का पर्स छीना है 
इसी भय से सुबह का हम टहलना छोड़ देंगे क्या 

दिखाई सख़्त देते हैं खड़े जो मोम के पुतले 
मगर वे आग के आगे पिघलना छोड़ देंगे क्या 

उन्हें कितना भी पूजो तुम पिलाओ दूध कितना भी 
मगर वे नाग फन से विष उगलना छोड़ देंगे क्या 

हवाओं की जगह अपनी दियों की है जगह अपनी 
हवा की धमकियों से दीप  जलना छोड़ देंगे क्या 

उन्हें मालूम है पत्थर मिलेंगे फल के आने पर 
वे आमों इमलियों के पेड़ फलना छोड़ देंगे क्या 

नियत निश दिन है 'भारद्वाज'उगना चाँद सूरज का 
 किसी दिन  राहु के भय से निकलना छोड़ देंगे क्या 

चंद्रभान भारद्वाज       

Tuesday, December 30, 2014

             उजाले क्या अँधेरे क्या

अवध की मस्त शामें क्या वनारस के सवेरे क्या 
अगर हों बंद आँखें तो उजाले क्या अँधेरे क्या 

दहक कर आग नफ़रत की जला जाती है बस्ती को 
उसे हिन्दू के डेरे क्या उसे मुस्लिम के डेरे क्या 

उगा है सूर्य बनकर जो चमकता ही है धरती पर 
उसे फिर तम के घेरे  क्या घने कुहरे के घेरे क्या 

रखा विश्वास की गठरी में जब संतोष के धन को 
तो फिर जीवन सफर में चोर डाकू या लुटेरे क्या 

किसी रिश्ते में अपने को कभी बाँधा नहीं जिसने 
समझता कैसे होते प्यार की गलियों के फेरे क्या 

गड़रिया ज़िन्दगी की भेड़ लेकर घर से निकला है 
तो बस्ती के बसेरे क्या तो जंगल के बसेरे क्या 

टिकी है नींव 'भारद्वाज' जब कच्चे धरातल पर 
महल सपनों के ढहने हैं वो तेरे क्या वो मेरे क्या 

चंद्रभान भारद्वाज  

Saturday, December 6, 2014

                     घबरा ही जाता है 

अचानक नब्ज़ बढ़ती है पसीना आ ही जाता है
 हरिक दिल प्यार में पहले-पहल  घबरा  ही जाता है 

सिखाती है बहुत अम्मा पढ़ाती है बहुत दादी 
नज़र के फेर में दिल फँस के धोखा खा ही  जाता है 

भरोसा टूटने लगता कदम भी डगमगा जाते 
मगर दिल ठान लेता है  तो मंज़िल पा ही जाता है 

न अपना होश रहता है न दुनिया की खबर कोई 
उलझ कर प्यार में गहरा नशा सा छा ही  जाता है 

डगर जब आगे बढ़ती है तो गलियाँ छूटतीं पीछे 
बिछुड़ता है सगा कोई तो रोना आ ही जाता है 

कड़ी संदेह की जब बीच में विश्वास के फँसती 
दिलों के बीच थोड़ा फासला गहरा ही जाता है 

सही सोचा सही देखा सही बोला सही जाना 
सही को भी मगर कोई गलत ठहरा ही जाता है 

अगर खतरे में औरत देखती है आबरू अपनी 
तो उसका हौसला फिर मौत से टकरा ही जाता है 

ठहरता रूप का सौंदर्य 'भारद्वाज'पल दो पल 
अगर ढलना शुरू होता है तो ढलता ही जाता है 

चंद्रभान भारद्वाज 

Friday, November 28, 2014

रेत के ढेर को आधार समझ बैठे हैं 
स्वप्न के महलों को साकार समझ बैठे हैं 

एक पत्थर की तराशी हुई जो मूरत थी 
उसकी मुस्कान को हम प्यार समझ बैठे हैं

घर में मेहमान से बनकर जो कभी आए थे 
आज वो घर पे ही अधिकार समझ बैठे हैं 

ज़िंदगी जीना भी आसान कहाँ दुनिया में 
लोग ज़ज़्बात को व्यापार समझ बैठे हैं 

एक शैतान तो बैठा है मसीहा बनकर 
और मसीहा को खतावार समझ बैठे हैं 

जाल फैलाया हुआ जिसने महज धोखे का 
सब उसी शख्स को अवतार समझ बैठे हैं 

बंद हैं चारों तरफ काँच की दीवारों में 
हम इसे आज प्रगति द्वार समझ बैठे हैं 

मंच के आगे खरीदे हुए पुतले हैं सभी 
वो जिसे अपना जनाधार समझ बैठे हैं  

हम 'भरद्वाज' गुनाहों से उठाते परदा
पर सभी हमको गुनहगार समझ बैठे हैं 

चंद्रभान भारद्वाज 

Thursday, November 20, 2014

             लिये बैठे हैं 

आप किस दौर के हालात लिये बैठे हैं 
दिल में बस बीती हुई बात लिये बैठे हैं 

अब यहाँ कोख भी मिलती है किराया देकर 
लोग बाज़ार में ज़ज़्बात लिये बैठे हैं 

एक मिट्टी की ही गुल्लक में है पूँजी अपनी 
वे तो स्विस बैंक की औकात लिये बैठे हैं 

अब तो रिश्ते भी बदलते हैं यहाँ पल पल में 
आप बचपन की मुलाकात लिये बैठे हैं 

सभ्यता आज की मंगल की सतह तक पहुँची
हम हथेली पे कढ़ी भात लिये बैठे हैं 

आजकल प्यार शुरू होता है मोबाइल पर 
वे निगाहों से शुरूआत लिये बैठे हैं 

शब्द होठों पे लिये बैठे हैं मीठे मीठे 
मन में वे अपने मगर घात लिये बैठे हैं 

अब तो सावन में न भादों में बरसते बादल 
पर वे आषाढ़ की बरसात लिये बैठे हैं 

अपनी आदत न 'भरद्वाज' बदल पाये हम 
पहली यादों को ही दिन रात लिये बैठे हैं 

चंद्रभान भारद्वाज

Thursday, October 9, 2014

                      संभाले हुए हैं    

घर की गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं 
एक बिखरा हुआ परिवार संभाले हुए हैं 

सुबह रोजी का न शामों को पता रोटी का 
ऐसे हालात में घरवार संभाले हुए हैं 

फैसले की है न उम्मीद हमारे हक़ में 
कुर्सियाँ सारी गुनहगार संभाले हुए हैं 

बोझ जंजीर का पाँवों पे सँभाला हमने 
आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं 

उसकी नीदों  में कहीं बिघ्न न आए कोई 
हम बुरे  वक़्त का हर वार संभाले हुए हैं 

जो कभी जंग के मैदान में उतरे ही नहीं 
आज बिन मूठ की तलवार संभाले हुए हैं 

जिनसे खुद तो न सँभल  पाया कभी घर अपना 
अब वही देश की सरकार संभाले हुए हैं 

अब सजा से भी उन्हें फर्क नहीं पड़ता है 
जेल में रह के भी दरबार संभाले हुए हैं 

जिसकी कथनी में असर है न असर करनी में 
लोग उस नाम को बेकार संभाले हुए हैं 

गाड़ियाँ उनकी चलाते  तो हैं रोबोट यहाँ 
वो रमोटों से ही रफ़्तार संभाले हुए हैं 

उनको मैदान में आने की जरूरत ही नहीं 
मोर्चा उनके तरफदार संभाले हुए हैं 

उगते सूरज को छिपाया है जिन्होंने अबतक 
खुद उजालों का वो बाज़ार संभाले हुए हैं 

ज़िन्दगी अपनी 'भरद्वाज' न सँभली हमसे 
उसकी यादों के वरक़ यार संभाले हुए हैं 

चंद्रभान भारद्वाज 

Tuesday, October 7, 2014

                     जिंदगी प्यासी रही 

देह भी प्यासी रही है रूह भी प्यासी रही 
प्यार की दो बूँद बिन यह ज़िन्दगी प्यासी रही 

माँग में सिंदूर है पर आँख में काजल नहीं 
गोद खुशियों से भरी पर हर ख़ुशी प्यासी रही 

प्यास लेकर जी रहा था प्यास लेकर मर गया 
आदमी का दिन भी प्यासा रात भी प्यासी रही 

तन का वैभव धन से है पर मन का वैभव प्रेम है 
तन का सागर है भरा मन गागरी प्यासी रही 

हर तरफ छाई बहारों का बताओ क्या करें 
कामना के बाग की जब हर कली प्यासी रही 

प्यास दुनिया की बुझाती  आ रही युग से मगर 
गंदगी  ढोती हुई अब खुद  नदी प्यासी रही 

आज बस्ती में निगम का टेंकर आया नहीं 
हर घड़ा प्यासा रहा हर बालटी प्यासी रही 

त्रासदी ही त्रासदी थी बाढ़ की चारों तरफ 
शहर पानी से भरा पर हर गली प्यासी रही 

भाव के पीछे कभी शब्दों के पीछे भागती 
व्यग्र 'भारद्वाज' की यह लेखनी प्यासी रही 

चन्द्रभान भारद्वाज