Sunday, February 15, 2009

ऊंची उड़ानों के लिए

पंख ही काफ़ी नहीं हैं आसमानों के लिए;
हौसला भी चाहिए ऊंची उड़ानों के लिए।

गाड़ने हैं जो फसल की चौकसी को खेत में,
चाहिए मजबूत खंभे उन मचानों के लिए।

रोक रक्खी है नदी की धार ऊपर ही कहीं,
है कुदाली की जरूरत अब मुहानों के लिए।

भीग जाती थी पलक सुनकर धुनें जिनकी कभी,
आँख में पानी कहाँ अब उन तरानों के लिए।

तख्त फाँसी का महज इक खेल का मैदान था,
लक्ष्य आज़ादी रहा था जिन दिवानों के लिए।

बन गई है देशसेवा चीज अब बाज़ार की,
लग रहीं हैं बोलियाँ निशदिन दुकानों के लिए।

भूख 'भारद्वाज' आकर फँस गई है जाल में,
घोंसले से तो चली थी चार दानों के लिए।

चंद्रभान भारद्वाज

8 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा....

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बन गई है देशसेवा चीज अब बाज़ार की,
लग रहीं हैं बोलियाँ निशदिन दुकानों के लिए।

उम्दा ग़ज़ल कही साहब. बधाई आपको.

अल्पना वर्मा said...

भीग जाती थी पलक सुनकर धुनें जिनकी कभी,
आँख में पानी कहाँ अब उन तरानों के लिए।

bahut hi umda gazal .

गौतम राजरिशी said...

बहुत सुंदर चंद्रभान जी....बहुत सुंदर
खास कर मतला तो गज़ब का है
और ये शेर भी ’रोक रक्खी है नदी की धार ऊपर ही कहीं,
है कुदाली की जरूरत अब मुहानों के लिए’

Prem Farrukhabadi said...

chandrabhan bhardwaj ji
भूख 'भारद्वाज' आकर फँस गई है जाल में,
घोंसले से तो चली थी चार दानों के लिए।
kya dard ko sameta aap ne. Badhai ho.

नीरज गोस्वामी said...

भीग जाती थी पलक सुनकर धुनें जिनकी कभी,
आँख में पानी कहाँ अब उन तरानों के लिए।

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने....हर शेर लाजवाब...बधाई.

नीरज

Manish Kumar said...

भीग जाती थी पलक सुनकर धुनें जिनकी कभी,
आँख में पानी कहाँ अब उन तरानों के लिए।

भूख 'भारद्वाज' आकर फँस गई है जाल में,
घोंसले से तो चली थी चार दानों के लिए।

bahut khoob !ye ashaar khas pasand aaye

dwij said...

बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई

और आभार
पंख ही काफ़ी नहीं हैं आसमानों के लिए;
हौसला भी चाहिए ऊंची उड़ानों के लिए।

भीग जाती थी पलक सुनकर धुनें जिनकी कभी,
आँख में पानी कहाँ अब उन तरानों के लिए।

भूख 'भारद्वाज' आकर फँस गई है जाल में,
घोंसले से तो चली थी चार दानों के लिए।