Monday, January 5, 2009

बर्फ पिघली और पानी हो गई,

वृद्ध असमय ही जवानी हो गई;
ज़िन्दगी किस्सा कहानी हो गई।

रेत बनकर रह गई बहती नदी,
और जड़ चंचल रवानी हो गई।

वक्त का हर बोझ कन्धों पर लदा,
उम्र झुक झुक कर कमानी हो गई।

खाद पानी या हवा का है असर,
कैक्टस सी रातरानी हो गई।

रात करवट और दिन उलझन हुए,
एक बेटी जब सयानी हो गई।

बात परदे में ढंकी शालीन थी,
खुल गई तो छेड़खानी हो गई।

आपने दुखती रगों को जब छुआ,
पीर भी कितनी सुहानी हो गई।

जो न आई होंठ तक संकोचवश,
बात आंखों की जबानी हो गई।

देख 'भारद्वाज' नज़रों का कमाल,
बर्फ पिघली और पानी हो गई।

चंद्रभान भारद्वाज

3 comments:

dwij said...

वक्त का हर बोझ कन्धों पर लदा,
उम्र झुक झुक कर कमानी हो गई।

रात करवट और दिन उलझन हुए,
एक बेटी जब सयानी हो गई।

लाजवाब.


मुझे आपकी ग़ज़लों का खज़ाना मिल गया है
. अब आता रहूँगा.
सादर

द्विज

मुकेश कुमार तिवारी said...

आदरणीय भारद्वाज जी,

वक्त का हर बोझ कन्धों पर लदा,
उम्र झुक झुक कर कमानी हो गई।

रात करवट और दिन उलझन हुए,
एक बेटी जब सयानी हो गई।

बहुत ही गंभीर पंक्‍तियाँ है. इस ब्लॉग पर आना बने रहेगा.

मुकेश कुमार तिवारी

SANJEEV MISHRA said...

रात करवट और दिन उलझन हुए,
एक बेटी जब सयानी हो गई।
आपने दुखती रगों को जब छुआ,
पीर भी कितनी सुहानी हो गई।

kitni sundar dii ghazal hai aapne
aapki bhi meharbaani ho gayii.
aaj ki taza khabar hain aap hii,
baaqi sab baaten puraani ho gayee.