Wednesday, December 3, 2008

पहले तो न थी

धुंध जो वातावरण में आज पहले तो न थी;
रोशनी की हर किरण रंगवाज पहले तो न थी।

लाँघ आई सरहदों को आदमी के नाम पर,
कुर्सियों की कैद में आवाज पहले तो न थी।

कर गई सारा शहर पल में हवाले आग के,
यह हवा इतनी करिश्मेबाज पहले तो न थी।

बांटती अपने लिए ख़ुद फूलमालाएं यहाँ,
मूर्ति वन्दनवार की मोहताज पहले तो न थी ।

कौन कब किसको बना लेगा निशाना क्या पता,
दाँव पर हर आदमी की लाज पहले तो न थी।

शर्त पहले ही रखी है ताज के निर्माण की,
बात ऐसी प्यार में मुमताज पहले तो न थी।

सेंकते जलती चिता पर लोग अपनी रोटियां,
ज़िन्दगी खुदगर्ज 'भारद्वाज' पहले तो न थी।

चंद्रभान भारद्वाज
(अरकान- २१२२ २१२२ २१२२ २१२)

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