Friday, November 28, 2008

आख़िर कब तलक

पीढियां ढोती रहें अभिशाप आख़िर कब तलक;
मंत्र सब उलटे पढोगे आप आख़िर कब तलक।

हर शपथ ली जा रही झूठी सरासर जब यहाँ,
हाथ गीता पर धरें चुपचाप आख़िर कब तलक।

ठोंक कर बैठा हुआ है वक्त कीलें पांव में ,
थिरकनें दे ढोलकों की थाप आख़िर कब तलक।

हक हड़प कर मंच पर बैठे हुए जो शान से,
यह सदी माने उन्हें माँ बाप आख़िर कब तलक।

भूत का अहसास देगी बंद कमरों में हमें,
सीढियां चढ़ती हुई पदचाप आख़िर कब तलक।

जब बदलते द्रष्टि के हर रोज पैमाने यहाँ,
ठीक उतरे आदमी का माप आख़िर कब तलक।

चेहरे पर और कालिख पोतवायेगा अभी-
कोख में पलता हुआ यह पाप आख़िर कब तलक।

क्या नपुंसक ही पधारे हैं स्वयंवर में सभी,
बिन प्रत्यंचा के रहेगा चाप आख़िर कब तलक।

आदमी अब सिर्फ़ 'भारद्वाज' आहुति होम की,
पूर्ण होगा कुर्सियों का जाप आख़िर कब तलक।

चंद्रभान भारद्वाज

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