Sunday, November 23, 2008

बिजलियों पर लिखूं.

वक्त कहता कि कुछ बिजलियों पर लिखूं;
पंख नोंची हुईं तितलियों पर लिखूं।

सर्जनारत भले ही रहें अनलिखी,
खून में पर सनी उँगलियों पर लिखूं।

कुछ लिखूं भूख पर कुछ लिखूं प्यास पर,
चाकुओं से गुदी पसलियों पर लिखूं।

भ्रम फुहारों का देकर न बरसीं कभी,
उन हवा में उड़ी बदलियों पर लिखूं।

जाल सम्बन्ध जिनसे निभाता रहा,
ताल की उन बड़ी मछलियों पर लिखूं।

हो गई बंद जिनके सुरों की खनक,
आज गूंगी पड़ी कजलियों पर लिखूं।

जो पड़ी हैं कबाडे के इक ढेर में,
खिन्न उन चर्खियों तकलियों पर लिखूं।

चंद्रभान भारद्वाज

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