Tuesday, November 18, 2008

देखली

प्यार की हर कसम तोड़ कर देख ली;
प्रीति छूटी नहीं छोड़ कर देख ली।

एक अहसास पीछा नहीं छोड़ता,
ज़िन्दगी हर तरफ़ मोड़ कर देख ली।

अब पलक पर बने अक्श मिटते नहीं,
मूर्ति पहली गढ़ी तोड़ कर देख ली।

रेशमी डोर की टाट के छोर से,
गांठ जुड़ती नहीं जोड़ कर देख ली।

पाँव बाहर कभी सिर कभी रह गया,
तंग चादर बहुत ओढ़ कर देख ली।

याद चक्कर लगाती वहीँ रातदिन,
वह पुरानी गली छोड़ कर देख ली।

दर्द की इक खनक के सिवा कुछ नहीं,
प्रेम गुल्लक भरी फोड़ कर देख ली।

चंद्रभान भारद्वाज

2 comments:

dwij said...

दर्द की इक खनक के सिवा कुछ नहीं,
प्रेम गुल्लक भरी फोड़ कर देख ली।

वाह-वाह. बहुत ही सुन्दर.


पाँव बाहर कभी सिर कभी रह गया,
तंग चादर बहुत ओढ़ कर देख ली।

पढ़ कर


मुझे अपना एक शे’र याद आया:

ढाँपे हैं हमने पैर तो नंगे हुए हैं सर
या पैर नण्गे हो गये सर ढाँपते हुए

सादर

द्विजेन्द्र द्विज

chandrabhan bhardwaj said...

Bhai Dwij ji, namaskar.
Aapne meri gazal padi aur apni comment bheji,iske liye bahut aabhari hoon. Mene bhi aapki kai gazalen 'Aaj ki Gazal' shirshak men padi hain.Aap bahut sunder gazalen likhate hain. Padkar maza aa gaya.Hardik badhai'
Chandrabhan Bhardwaj.
chandrabhanbhardwaj.4@gmail.com